भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें६०८ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
चौथा गुड़ जिम नरक महारे । गुड़ रस ज्यों औटत है हाँरे ॥
कूप नरक कूये सम जानों । लोहू पीप भराहै मानों ॥
महा कीट नरक बतलाऊं । तामें कीड़े भरे बताऊं ॥
असिपत्तर वन नरक कहीजे । खाँड़ेकी सम पात लहीजे ॥
नरक सुदारुण है भय भीता । तेज बड़ा तीक्षन दुख दीता॥२२॥
दोहा ॥
एक नरक निरस्वाँस है, तहाँ घुटे जो स्वाँस ।
ऐसा दुख हां होत है, ज्यों ठगमारी फांस ॥ २३ ॥
कुल संकुल जो नरक है, ताही कूँ सुनलेह ।
पापी कूँ संकलों सहित, जकड़े वाकी देह ॥ २४ ॥
चौपाई ॥
सूचीमुख पापी जो पावै । सुई छेक मुख हो गिरजावै ॥
महाघोर नरक अति भारी । तामें भैहै अधिक अपारी ॥
सूलही रूप नरक कूँ जानौं । सूली की ज्योताही पिछानौं ॥
नर्क अगनकुण्ड महातपत है । ताकूँ देखे हिया कंपत है ॥
नरक तेल जंत्र जो देखा । कल्हू की समताहि बसेखा ॥
दुखद दुख की खान घना है । नरक वही दुखरूप बना है ॥
अंधकार जो नरक बताऊं । महा अंधेरा तहाँ सुनाऊं ॥
नरक विलोचन वही कहावे । जहाँ जाये अंधा होजावे ॥२५॥
दोहा ॥
अति गरमी जाड़ा घना, भयानक खग सुन लेह ।
परवत सँू दैं डारिकैं, सस्तर छेदैं देह ॥ २६ ॥
ऐसे ऐसे दुख घने, पततन बारमबार ।
खोटे कर्मन के किये, दुखी लखे नर नार ॥ २७ ॥
इति श्रीनासकेतोपाख्याने नरकवर्णनोनाम अष्टमोऽध्यायः ॥ ८ ॥