भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
पृष्ठ 658, कुल 690 में से
संदर्भ में पढ़ेंनासकेतलीलावर्णन । ६१५
विषय भोग बोरा भया, भूला शील अरु धर्म ॥ ५॥
चौपाई ॥
निरस्वास नरक विकरारा । जामें पतितन कूं दुखभारा ॥
ऐसे पापन सों हां जावै । जो वे गुरुकी बस्तु चुरावै ॥
ब्राह्मण तथा देवता होई । इनका अंश चुरावै कोई ॥
बूढ़े अरु बालक का लीया । माल चुराय बहुत दुख दीया ॥
कै बूढ़ी कै बिधवा नारी । तिनका दरब चुराय अनारी ॥
जाय परत है नरक मंझारा । श्वासरुकै जहां दुःख अपारा ॥
दसवां कुल संकुल जो देखा । तामें दुखहै अधिक विशेखा ॥
ब्राह्मण क्षत्री शुदर वैशा । भारी पाप किया जिन ऐसा ॥
मांस खाय मदिरा जिन पीया । सोवा नरक माहिं गहदीया ॥
मारा जीव मांस ले खाया । जाका पातक बहुत बताया ॥
मोल मंगाय लाय जो खावैं । सोभी पापी बहु दुखपावैं ॥
उसी ठौर मैं यही निहारा । भयानक अधिकी दुखहां भारा ॥
अगनरूप जलते द्रुम देखे । दस जोजन लांबे जु बसेखे ॥
जोंजन पांच घेर विस्तारा । एक एक का न्यारा न्यारा ॥
संकल सूं हां बांधै पापी । हाहा शब्द कहैं संतापी ॥
जम लोहे की लाठी मारैं । मुगदर सों सिर फोर ही डारैं ॥
उनका चिमटों चाम उपाड़ैं । सीसा तावैं मुख में डारैं ॥
वेतो जलते अधिक पुकारैं । ज्यों ज्यों जम तामसकर मारैं ॥६॥
दोहा ॥
नरक ग्यारवां कहतहूँ, सूचीमुख है नाम ।
तहां अधिक दुख होत है, महाबुरी वह ठांव ॥ ७ ॥
चौपाई ॥
जहाँ जायकै पापी पड़ई । जो कोई ऐसे करम करैई ॥