भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें६०६ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
चौपाये कूं बहुतै मारै । छिपकर परघरही कूं जारै ॥
पक्षी पकड़ फन्द में डारै । जीव हतन की मन में धारै ॥
हरे बिरछ कूं जो वे काटैं । अरु चोरीकर लूटत बाटैं ॥
गऊ ब्राह्मण की कर घातैं । मात पिता सूं टेढ़ी बातैं ॥१३॥
दोहा ॥
जार करम हित सूं करै, गरभ गिरावै जान ।
पर निन्दा बहुती करैं महा मूढ़ अज्ञान ॥ १४ ॥
चौपाई ॥
और वै हैं विस्वासी घाती । बोलैं झूठ महा अपराधी ॥
झूठी साख भरै न लजावैं । परघरही सूं धन ठगलावैं ॥
जाका नोन खाय वा मारै । रस्ते मांहि आगहू डारै ॥
खुशी होय परकी कर हांसी । मनमें राखै सब सूं गांसी ॥
डिभ कपट छल भगल अहारा । जो कुछ किया सो नांहि विचारा ॥
साधसंग में मन नहिं दीन्हा । गुरुका कहा पंथ नहिं चीन्हा ॥
बेमुख हो आवना त्यागैं । दुनियां के दुख धंधे पागैं ॥
वेद पुरानन कों नहिं मानैं । शास्त्र की निन्दाही ठानैं ॥
पाप अनेक करत नहिं डरैं । मनमें पाप पाप धुन धरैं ॥
औगुन ग्राही गुन नहिं पकड़ैं । दीन होय जासों बहु अकड़ैं ॥
धरमजु अपने स्वामी केरा । ताकी निन्दा करै घनेरा ॥
परकी चुगली हित कर करैं । गुरूके बचन न हिरदै धरैं ॥
रिण देवैं अरु ब्याज बढ़ावैं । ताका धान खुशी हो खावैं ॥
ब्याज लैन में भारी हान । निरफल जाय करै जो दान ॥
हाय हाय कर जनम गंवावै । सब कुछ रख संतोष न आवै ॥
संकल फांसी जिन गल माहीं । दक्षिण द्वारे होते जाईं ॥१५॥