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सर्वकोश
भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)

भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)

Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas

सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished690 पृष्ठ

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पृष्ठ 650

नासकेतलीलावर्णन । ६०७
दोहा ॥
दक्षिण द्वारे. और हैं, सबै नरक दुखदाय ।
अति कलेश जहां होत है, पतितन कूं हां जाय ॥ १६ ॥
सुनो ऋषी अब कान दे, जमदूतों का रूप ।
काले सुरमे की तरह, अति ही घोर सरूप ॥ १७॥
जित पापी हाहा करै, हो रहा अति ही शोर ।
अंधकार ऐसा जहां, सूझै निस नहिं भोर ॥ १८ ॥
चौपाई ॥
जहां किरम कुत्ते अरु कागा । बीछू रीछ अरु काले नागा ॥
अरु कांटे लोहे सम भाला । चीते गिद्ध सिंह बिकराला ॥
जमके दूत जहां बलकारी । लोहे के मुगदर कर भारी ॥
जासूं पतितन के सिर मारैं । त्राह त्राह कर बहुत पुकारैं ॥
उस द्वारे में नरक घनेरे । सो मैं अपनी आखों हेरे ॥
सुनत रोम ठाढ़े होजावैं । कंपै कलेजा अति थहरावैं ॥
सुनो ऋषी मै कहूं जु सारी । देख डरा उपजा भै भारी ॥
नरकोंमाहिं जीव बहु भरिया । मोदेखत बहुतक जहां गिरिया १६
दोहा ॥
नरक हजारों है जहां, हाय हाय ही होय ।
जीव पुकारत है पड़े, आगे सुनिये सोय ॥ २० ॥
तिनही में जो हैं बड़े, नरक अठारह मुख्य ।
नाव बखानूं जिनन के, अरु ह्वाँके सब दुख्य ॥ २१ ॥
चौपाई ॥
पहिले कुंभीपाक सुनावैं । जीवनकुं तामाँहि पकावैं ॥
दूजा नरकु अबीची खोला । लहर उठें जी खाँहि झकोला ॥
रौरव महा नरक जो भारा । जी रोवै बहु करैं पुकारा ॥