भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंनासकेतलीलावर्णन । ६१३
आनन बहुत बिलाव से, बहुतन के मुख बैल ।
घोड़े से मुख बहुत हैं, चित खोटे तनमैल ॥ १७ ॥
थोरे से बरनन किए, अरु मुख नाना रूप ।
तनमाहीं जौं रोंगटे, दीखत है बिट रूप ॥ १८ ॥
चौपाई ॥
काहूके करमें तिरशूला । काहूके कर जलता पूला ॥
काहू हाथ में तीक्ष्ण बरछी । कै तोपैं तलवारैं तिरछी ॥
बहुतौं के कर मुगदर भाले । गदा कुल्हाड़े हैं विकराले ॥
बहुतौं के कर मूसल लाठी । बहुतों के कर लोहे साठी ॥
और गोफन है हाथौं तिनके । और और कर सस्तर जिनके ॥
सस्तर लीयें जु गिनती नाहीं । ऐसे दूत लखे ऊंह ठांहीं ॥
धरमराय की आज्ञा साथा । छेदत हैं पतितन के गाता ॥
मारैं बांधै दया न नेको । महाकलेश तहां मैं देखो ॥ १६ ॥
दोहा ॥
-नासकेत ऐसे कही, नैनों देखी बात ।
रनजीता यों कहत है, सब ऋषियों के साथ ॥ २० ॥
चौपाई ॥
और दूत घोरी मुख तिनका । पैनी डाढ़ कान बड़ जिनका ॥
मोटे होठ खड़े जो केशा । नैनालाल अगन के भेशा ॥
ऐसे जम पतितन के ताहीं । डारैं असिपत्तरबन माहीं ॥
कामी क्रोधी जो नर जावैं । उन कूं वै बहुत्रास दिखावैं ॥
जो कोई काटै हरिया पीपल । और चुरावै बाड़ी में फल ॥
काटैं वृक्ष जीव दुख देवै । झूठी साख भरै दरब लेवै ॥
राखा बरत भंग कर डारै । गुरका धरम-सीस नहिं धार-॥