भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
पृष्ठ 654, कुल 690 में से
संदर्भ में पढ़ेंनासकेतलीलावर्णन । ६११
संयम पूजा कछू न जानी । बेमुख चाल चला मनमानी ॥
तरपन अरु नित नेम न कीना । गायत्री में चित नहिं दीना ॥
अरु पूरा सतगुर नहिं करि हैं । रौरव नरक मांहि सो परिहैं ॥
चौथा नरक सो गुड़ जिम जानौ। औटत रहत कड़ाहा मानौँ ९॥
दोहा ॥
जामें पापी जीवही, परत आयही आय ।
जिन पापों से गिरत है, सो मैं कहूं सुनाय ॥ १० ॥
चौपाई ॥
जो काहू के बसन चुरावै । विद्या पढ़ गुरकूँ बिसरावै ॥
काहू कारज भांजी मारै । अरु कहू का बुरा बिचारै ॥
सकर काहू की हर लावै । और लोह गुड़ नून चुरावै ॥
गुड़ जिम नरक सुभुगते सोई । तामें अधिक महादुखहोई ११॥
दोहा ॥
कूप नरक है पांचवां, जाका करूं बखान ।
तामें लोहू पीप है, कूंवेकी सम जान ॥ १२ ॥
चौपाई ॥
तापै काग बहुत घिर रहिया । बड़ी चोंच लोहे सम घरिया ॥
तामें पापी कूं गहि डारै । तिरआवै वह चोंचहि मारै ॥
बड़े पतित मूरख अभिमानी । जनम पाय हरिभक्ति न जानी॥
पूरा सतगुरु ढूंढ़ न कीना । परमेश्वर का नाम न लीना ॥
साधन की संगति नहिं कीनी । कथा कीरतन सुरत न दीनी ॥
अरु दासी सँग गमन करत है । सोभी याही नरक परत है ॥
हिरदय दया क्षमा नहिं आई । मनुषा देही रतन गंवाई ॥
यासम पाप और कहा होई । कूप नरक में डूबै सोई ॥
महा कीट छठा जो देखा । कूप की जो ताहि बसेखा ॥