भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें६१२ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
तामें विष्ठा बहुते भरिया । कुलबुलाट कीड़ोंने करिया ॥
बड़े बड़े कीड़े ता माहीं । पापी के तनमें चिपटाहीं ॥
भली वस्तु जिन छिपकर खाही । आप अकेले दिया न काही ॥
आपही आप सुगन्ध लगाई । काहूका लिया अन्न चुराई ॥
अरु ऐसे बहु पाप कमावै । सो महाकीट नरकमें जावै १३॥
दोहा ॥
नरक सातवाँ जानिये, असिपत्तरबन नांव ।
दरखत की सम है बड़ा, पातदु धारै श्याम ॥ १४ ॥
चौपाई ॥
ज्यों तरवार पात वे पैने । पतितनकूँ भारी दुखदैने ॥
पापी कूं वा नीचै लावै । खड़ा करै नाहीं बैठावै ॥
पात झड़े खांड़े सम लागे । कटै माँस हाड़ ही ताकै ॥
त्राहि त्राहि जहां होरही भारी । सुनकर चेतै नाहिं अनारी ॥
सुनौ ऋषीश्वर और तमासा । देखा धरमराय के पासा ॥
काहू जमका कोइल बाहन । कोऊ काग चढ़े ही जाहन ॥
कोऊ हिरन चढ़ा ही जावै । कोऊ गीदड़ चढ़ा डरावै ॥
उनके मुख विकराल बने हैं । नानाविध भये रूप ठने हैं ॥
कालारंग कठोर बड़ेही । अधिकी तामस भौंह चढ़ेही ॥
नेतर लाल डरावन तीखे । दुखदाई वे पापी जीके ॥
तनमाहीं दुरगन्ध जु आवै । लांबी काया अति डरवावै ॥
मोटी देही ऊंचे केश। बहुतोंकामुख करहै भैसा ॥१५॥
दोहा ॥
बहुतों के मुख श्वान से, बहुतों के मुख बाघ ।
बहुतक चीते मुखबने, बहुतों के जों नाग ॥ १६ ॥