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सर्वकोश
भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)

भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)

Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas

सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished690 पृष्ठ

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पृष्ठ 657

ऐसे पाप करें बजमारे । नरक सातवें जा हत्यारे ॥२१॥
इति श्री नासकेतोपाख्याने नरकवर्णनोनाम नवमोऽध्यायः ॥ ६ ॥
नासकेत उवाच ॥ दोहा ॥
नरक सुदारुण और है, महाकष्ट की खान ।
जहां कामी नर नारही, भुगतैं बहु दुख मान ॥ १ ॥
चौपाई ॥
बहुते खंभ नारकी सूरत । बहुते पुरुष रूपकी मूरत ॥
जो कोइ परतिरिया गल लावैं । जिनकों जलते खम्भमिलावैं ॥
कहैं कि अपना कीया भोगो । अब क्यों मनमें मानत सोगो ॥
वा नारी कूं लेह पिछाना । जाके संग बहुत सुखमाना ॥
विरथा मनुषा देह गँवाई । तुमर्ते खर कूकुर अधिकाई ॥
जो नारी पर पुरषा माती । खोटा करम किया वा साथी ॥
तिनके कारन खंभ तपाये । बहुती लाल किये उरलाये ॥
जमकहै यह तो जार तुम्हारे । इनकी सूरत लेहु निहारे ॥
जिनके संग काम बस रतियां । तुमतें भली गधी अरु कुतियां ॥
आगैसें सूझा नहिं तुमकूं । कै तुम सुना नहीं था हमकूं ॥
भुगतो याही नरक मँझारी । निकसन की आवै नहि बारी ॥
क्रिया जो काम अजोग निरारा । परमेश्वरका आयसु टारा ॥२॥
दोहा ॥
जरते थंभों बांधकर, मार कहै जम ओह ।
जो कुछ कीया जगत में, जाका फल अवलोह ॥ ३ ॥
त्रास इसी जमलोक का, सुनता था अकनाहिं ।
तन मन सूँ लागारहा, मैथुनही के माहिं ॥ ४ ॥
परवी अरु दिन बरतके, किया जो मैथुन कर्म ।