भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें६१० श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
बहुत बरस निकसन कूं लागै । जैसी करै सो आवै आगै ॥
तीजा नरक महा भयकारी । रौरव नांव जहां डरभारी ॥
ताकूं देख कंपत है देही । शुभकर्मों बिन कौन सनेही ॥५॥
दोहा ॥
जामें तप्ती रेत है, सूरज सदा तपाय ।
इकरस जलताही रहै, नैकन कभू सिराय ॥ ६ ॥
चौपाई ॥
रोवैं जीव अनेक पड़ेही । कबहूं बैठैं कबहुं खड़ेही ॥
अति व्याकुल तिनकौं दुखभारा । त्राह त्राह कर उठैं पुकारा ॥
करम कहूँ उनके अब कीये । ता पापन सूं वामें दीये ॥
पहल नारि सूं भोग विचारै । रूप ढरै तब मन सूं डारै ॥
राजविषै जिन न्याव न कीना । अपनी परजाकूं दुख दोना ॥
बिन औगुन डांडै अरु मारै । करै कुन्याय बंध में डारै ॥
अरु जिन ब्राह्मण वेद पुराना । पढ़ि पढ़िके कछु भेदन जाना ॥
वेदनमें के कर्म न कीने । पाखण्ड कर करही द्रव्यलीने ॥
आनदेव अरु गिरह पुजाये । हरि ओरी कूं नाहि लगाये ॥
पेटकाज भूम डारत डोलै । अपने स्वारथ मिथ्या बोलै ॥७॥
दोहा ॥
ब्राह्मण क्षत्री वैश्य जो, अरु शुदर जगमांहिं ।
अपने अपने धरमकी, राह संभारत नांहि ॥८॥
चौपाई ॥
राह वेद की चलते नाहीं । बे मरजाद रहैं जगमाहीं ॥
संक्रायत व्यतिपात न जानैं । द्वादसी मावस ना पहिचानैं ॥
समय पायहु दान न दीया । रसना हरिका नाम न लीया ॥
तिथि अरु परबी समै न साधी । चौकान्हान तजा अपराधी ॥