भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंनासकेतलीलावर्णन । ६०६
ऋषि उवाच ॥ दोहा ॥
नरक इकट्ठे तुम कहे, नासकेत महाराज ।
जुदे जुदे बरनन करो, हमें सुनावो आज ॥१॥
नासकेत उवाच ॥ चौपाई ॥
नासकेत कहै सबै सुनाऊं । एक एक कूँ जुदा दिखाऊं ॥
सभी ऋषीजो ह्वां चित दीजै । नरकोंकी गति सब सुनलीजै ॥
पहिले कुंभीपाक कहतहूं । ता डर सं हरिध्यान धरतहूँ ॥
जा जा पापी जहां परत है। जम जिनकूँ बहु मार धरतहै ॥
उन पापी जो पाप कमाये । सो तुमसूं अब कहूं सुनाये ॥
गऊ ब्राह्मण पशु बहु मारै । पक्षी आदि जीव हनडारै ॥
दानकरत भांजी जो मारै । अरु ब्रह्मचारी का तप टारै ॥
और गरीबन कूं हनडारै । और मित्रका घात विचारै ॥
सोवे कुंभी नरक मँझारी । जाय परत है नरकें नारी ॥
कुंभीपाक कहूं परवाना । जाका मुख है घड़े समाना ॥
सोलह जोजन तल बिस्तारा । बहुदुख पावे गिरने हारा ॥
बड़े बड़े कीड़े लग जाहीं । महादुर्गंध बुरी तिह माहीं ॥
तामें बहुत बरस दुख पावै । पाप भुगत कर बाहर आवै ॥
दूजा नरक अवीची आगे । वामें गिरै पाप अस लागै ॥२॥
दोहा ॥
अधम संग जोपै करै, कन्या डारै मार ।
अभक्ष भक्ष गुरु कूं हनै, गर्भ गिरावै नार ॥ ३ ॥
जो कोइ अवै पाहुना, अपने घरके माहिं ।
अनजल की पूछी नहिं, आदर दीया नाहिं ॥ ४ ॥
चौपाई ॥
नरक अवीची में दुख भारी । पापी भुगतें नर कहा नारा ॥