भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंनासकेतलीलावर्णन । ६०५
साथ अप्सरा हरि गुणगावैं । करत कीरतन ही ले जावैं ॥६॥
दोहा ॥
पूरबद्वारे की कही, सुनों ऋषीश्वर चैन ।
पच्छिम द्वारा अब कहूं, सोभी है सुख दैन ॥१०॥
चौपाई ॥
जिन मात पिताकी आज्ञामानी । पर निन्दा कबहू नहीं ठानी ॥
नित्त प्रति कुछ कीया दाना । परधन कूं विंष्ठा सम जाना ॥
काम क्रोध जिनके नहीं मोहा । काहूँ सें राखै नहिं द्रोहा ॥
परतिरिया मनमें नहीं लीनी । नारायन की पूजा कीनी ॥
वे पच्छिम द्वारे हो जावैं । अपने लक्षन सूं सुखपावैं ॥
द्वार तीसरे की सुन बाता । सभी सुनाऊं ताकी काथा ॥
जो प्रानी है पर उपकारी । पर कारजहित दुखसहैं भारी ॥
अपने कारज ढील लगावैं । पर कारज कूँ उठ उठ धावैं ॥
आपन दुखसह पर सुख दीना । जीवत परमारथही कीना ॥
आप धर्म कर और करावैं । हिरदय दया नाम चितलावैं ॥
सो जावैं उत्तरही द्वारै । साधरूप गण तिनके लारै॥११॥
दोहा ॥
विष्णु भक्ति की नेष्ठा, साध विप्र की सेव ।
धर्म बरत में डिढ रहै, सिरपर रख गुरुदेव ॥१२॥
चौपाई ॥
अरुभलेकर्म जिन कीने नाहीं । खोटे कर्मन के पडमाहीं ॥
सो चौथे द्वारे हो जावैं । बाटमाहिं जम बहुत सतावैं ॥
पाप किये जिन ऐसे ऐसे । सबही खोल बताऊं तैसे ॥
दुष्टबड़े तनमन दुखदाई । सब जीवन सूं करै बुराई ॥