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भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)

Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas

सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished690 पृष्ठ

५७४ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ।
उपजा वाके बीरज सेती। कही सांच मानियो जेती॥
बालक बचन सुने जब माई। वह बहुती अचरज में आई॥१७॥
दोहा॥
जबै मोह बश होय कै, गोदी लिया उठाय।
फिर मुख में अस्तन दियो, खुशी भई अधिकाय ॥ १८॥
चौपाई॥
बालक शोभा कहा बखानूं। रूपवंत अरु धुर सूं ज्ञानूं॥
ऋषि के आश्रमही के माहीं। पालन लगी जिसी के ताईं ॥
लज्या दुख लियें रहै सुभागा। इकदिन बालक रोवनलागा॥
थांभा थमै न क्योंही कैसे। कीया क्रोध सुभांगी जैसे॥
हे पुत्तर रोवत क्यों भारी। तोही कारन बनमें डारी॥
वैशंपायनउवाच ॥
हूवा था जब एक बरस का। रूपवंत गुणवंत सरस का॥
क्रोध सहित माता मन आई। वहीं पिटारी एक बनाई॥
तामें बालक कूं पौढ़ाया। कुशाघासतापै लिपटाया॥१६॥
[दोहा॥
गही पिटारी आयकर, गंगा दिया बहाय।
तब कन्या उस पुत्रकूं, ऐसे कहा सुनाय॥२०॥
चौपाई॥
कौन गरभ का मैं नहीं जानूं। तेरे पिताकूं मैं न पिछानूं॥
जाके बीरज भया उपाधू। ताही के ढिग बहकर जातू॥
जब बालक वह बहता चला। आगे सुन होतबकी कला॥
बालक आया बहते बहते। जहां ऋषेश्वर बहुतक रहते॥
उद्दालक रहता था हांही। तेजवन्त तपसी अधिकाई॥
लखी पिटारी आवत सबही। पर लीनी उद्दालक तबेही॥

नासकेतलीलावर्णन । ५७५
लाकर राखी अपने ठांहीं । आप लगा शुभ कर्मों माहीं ॥
वेद करम सबही करि लीन्हें । पित्तरकारज भी सबकीन्हें॥२१॥
दोहा ॥
शुभकर्मों से छूटकर, खोला फेर पिटार ।
जो देखे तो पुरुष इक, सुन्दर अधिक अपार ॥२२॥
चौपाई ॥
गुणवन्ता अरु लक्षण धारी । ध्यान जोगमें था बलकारी ॥
उस बालक कों ऐसे लहिया । ज्ञानवान ऋषि जब यों कहिया ॥
हे बालक अब बसतू यहाँही । मेरे सुन्दर आश्रम माहीं ॥
ऐसे कहि राखा धर्मशाला । लागा बहुर करन प्रतिपाला ॥२३॥
इति श्रीनासकेतोपाख्याने पितापुत्रसंयोगोनाम
तृतीयोऽध्यायः ॥ ३ ॥
चौपाई ॥
एकदिना वाकी महतारी । गया क्रोध जब बात विचारी ॥
जिंह कारन बहुते दुखपाया । सो बालक मैं गंग बहाया ॥
सोच सोच मन में पछताई । गंगाकूल ढूंढ़ने धाई ॥
व्याकुल भई रोवती चाली । अपनी बुध कूं देती गाली ॥
चलती चलती पहुंची तहाँ । उद्दालक रहता था जहाँ ॥
तहाँ अपना बालकही पाया । भरिकै अंकौं गले लगाया ॥१॥
दोहा ॥
देख बहुत प्रसन्न हो, कही द्योस धन आज ।
ढूँढ़न कूं निकसी हुती, सो भए पूरन काज ॥ २ ॥
चौपाई ॥
यों कहि फिर बैठी वह बाला । बालकलियनलगो जज्ञसाला ॥
कन्या कही लीप कहा करिहो । को कारज या ऊपर सरिहो ॥

५७६ : श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
नासकेतउवाच ॥
जब बालक कही पिता हमारे । आज्ञा दे वन ओर सिधारे ॥
तातें लीपतहूं जज्ञसाला । आय करें जज्ञ वै मधकाला ॥
मातोवाच ॥
कन्या कही पुत्र तुम मेरे । ला मैं लींपूं बदले तेरे ॥
जब बालक लीपन नहिं कीन्हा । सकल सौंज माता कर दीन्हा ॥
चित्त दे लीपा सुन्दर बाला । और दिना सूं नीकी शाला ॥
चरणदास कहै फुल्लित भई । गंगा न्हान करन कूं गई ॥३॥
दोहा ॥
तब उद्दालक आइया, बनते अपनी ठाहिं ।
बालक सों धन धन कहा, खुशी भये मन माहिं ॥ ४ ॥
उद्दालकउवाच ॥
पुत्तर झाडू भलीदे, लीपन किया बनाय ।
अगन होत्रका मंडही, नई भांति दरसाय ॥ ४ ॥
बहुत खुशी तौपै भया, सुन्दर मन्दिर देख ।
ऐसा लीपाना कभी, जैसा आज बसेख ॥ ६ ॥
नासकेतउवाच ॥
पिता सुनौ लीपन करम, मैं नहिं कीया आज ।
मेरी माता आइया, जिन यह कीया काज ॥ ७ ॥
उद्दालकउवाच ॥
चौपाई ॥
हे पुत्तर तेरी जो माई । कारज करिके कितकूं धाई ॥
नासकेत सुनि ऐसे कही । गंगा ओर न्हान कूं गई ॥
सुन यह बचन खुशी ऋषि भयऊ । बहुरूं अगन होत्र चित्तदियऊ॥
करि करि करमजु बोलत भया । पुत्तर का कर कर मैं लिया ॥
फिर वासुं कही गंगा जावो । अपनी माता कूं ले आवो ॥

नासकेतलीलावर्णन । ५७७
आदर करके परसन करूं । पुष्पमूल ले आगे धरूं ॥
बचन पिता के सुनि वहां गया । हाथ जोरि मातासों कहा ॥
नासकेतउवाच ॥
हे माता चल आश्रम माहीं । जहां मम पिता बसोतुमहाहीं ॥
कंद साग नीकै करि पावो । ऐसे सुख सूं द्योस बितावो ॥
माताउवाच ॥
सुनि चन्द्रावती कहा बिचारा । क्यों सुतबचन अजोग उचारा ॥
सुनि करि रोम उठै तन सारे । बिना धर्म का वचन कहारे ॥
आगे भी किन्हीं यह जसलीया । माता दान पुत्र ने कीया ॥८॥
दोहा ॥
जग में ऐसी रीत है, पिता करै जो दान ।
कै कन्या का भ्रातही, कै मामूं परवान ॥६॥
नासकेत चुपका भया, मन माहीं सकुचाय ।
उठ आया ऋषिपासही, सबही दिया सुनाय ॥१०॥
चौपाई ॥
हे पुत्तर उन आछी भाखी । धर्मशास्त्र में योंही राखी ॥
कहो उदालक फिर ह्वां जइए । मेरे मुखसों ऐसे कहिए ॥
कौन वंश में जन्म तुम्हारा । कैसे उपजन भया हमारा ॥
कौन काजकों तुम यहां आई । यह सब बातें पूछो जाई ॥
बचन पिता के सुन वह धाया । माता कूं जा शीश नवाया ॥
नासकेतउवाच ॥
फेर कही सुन मेरी माता । पूछन कूं पठयो मम ताता ॥
काकी धीको पिता तुम्हारो । कैसे तुम्हरे जन्म हमारो ॥
इहां आवन को कारन को है । सतसत कहू ज्योंकरि जो है ॥

५७८ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ।
माताउवाच ॥
दोहा ॥
चंद्रवती यों बोलिया, सुन पुत्तर परवीन ।
जो तू पूछत है मुझे, मैं कहूं चित दे चीन्ह ॥ १२॥
परालबध के जोग तें, करम भया जो जान ।
सो मैं तोसों कहत हूं, साखी इक भगवान ॥ १३ ॥
सूरज ही के वंश में, रघु राजा परसिद्ध ।
मैं हूं बेटी तासु की, शुभ करनी सब सिद्ध ॥ १४ ॥
चौपाई ॥
चूने लीपे मंदर माहीं । रहती हुती सीक कछु नाहीं ॥
दसहजार कन्या ढिग रहतीं । भांति भांनि मम सेवा करनीं ॥
एक समै मैं गंगा गई। जहां जाय कै न्हाती भई ॥
लिपटा कुशा कमल इक आया । पकड़ा खोला नाक लगाया ॥
वामें बीरज मैं नहिं जाना । नाक छेद हो उदर समाना ॥
वासों मोकूं गरभ रहा था। सखियों लखि मम मात कहा था ॥
फिर रानी राजासों कह्यो । पिता बनोबास मोहि दियो ॥
रोवन लगी बहुत दुख पाया । वहां ही एक तपस्वी आया ॥१५॥
दोहा ॥
बेटी कर धीरज दिया, लें गया आश्रम माहिं ।
ह्वां सुखसों रहने लगी, सोच रहा कछु नाहिं ॥१६॥
चौपाई ॥
हे पुत्तर उपजा तू ह्वाहीँ । नासा के मध जन्म्यों आई ॥
तातें नासकेत धरयो नाऊँ । पलने लगे बहुर वह ठाऊँ ॥
बरस दिनाके हो सुख पागे । घुटनौं पैरौं चलने लागे ॥
इक दिन रुदन किया तुम भारा । मैं किरोध करि गंगा डारा ॥१७॥

नासकेतलीलावर्णन । ५७६
दोहा ॥
तभी रोस मोहि आइया, लीन्ही तुला बनाय ।
तामें तोहि सुलायकै, दीन्हों गंग बहाय ॥१८॥
चौपाई ॥
चार बरस पीछे सुध आई । बड़ी भई जब मैं पछताई ॥
जिह कारन बन लिया बसेरा । सुख छुटकै दुख हुवा घनेरा ॥
उपजा मोह क्रोध सब भागा । मन में तू बहु प्यारा लागा ॥
कलप कलप जिय रहा न जाई । तब उठ ढूंढनही कों धाई ॥
ढूंढत ढूंढत अब तोहिं पाया । आंखसुखी हुई हिया सिराया ॥
सुनरे पुत्तर यह मम बाता । जाय कहो तुम अपने ताता ॥
नासहीकेत उलट जब आया । पिताकूं सबही भेद सुनाया ॥१९॥
वैशंपायनउवाच ॥ दोहा ॥
सुनि उद्दालक हुलस मन, ब्रह्मा बचन संभार ।
चले संग ले बालका, जित चन्द्रावति नार ॥२०॥
चौपाई ॥
गये जहां बैठी बड़ भागी । मन सकुचा उठ चरनौँ लागी ॥
चरनों से दोउ नैन छुवाये । कहीं धन्य हम दरशन पाये ॥
देख ऋषीश्वर ने सुख पाया । हँस करि ऐसे बचन सुनाया ॥
चलिये रहिये सुत के पाहूं । मैं राजा रघु के ढिग जाऊं ॥
तीनौ मिल आश्रम में आये । करि भोजन सबही हुलसाये ॥
नासकेत चन्द्रावति बाला । दोनों राख चला धर्मसाला ॥
भोर भये अरु बहुत संवारा । उद्दालक ने गवन विचारा ॥
चरनदास कहै मन धरि आसा । जा पहुँचा राजारघुपासा ॥२१॥
दोहा ॥
राजा बहु आदर कियो, सिंहासन बैठाय ।

५८० श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
चरनों सिर धरि यों कहा, कृपा करी तुम आय ॥२२॥
उद्दालकउवाच ॥ चौपाई ॥
उद्दालक कहो बचन अनूपा । देखे पिरथी पर बहुभूपा ॥
तो सम राजा और न दूजो । तेरी वड़ी आरवल हूजो ॥
राजोवाच ॥
हाथ जोरकर पूछी बाता । किह कारन आये तुम नाथा ॥
मनमें हो सो अज्ञा दीजै । वही कामना हमसूं लीजै ॥
उद्दालकउवाच ॥
ऐ राजा मोहिं कछू न चहिये । सभी त्याग जंगल में रहिये ॥
मैं आयो यह इच्छा मेरी । कन्या मांगन आयों तेरी ॥
वंस वढ़ावनही के काजा । मोसे सुनों सांच यह राजा ॥
जाकूं दीजे मोहि परनाई । अपने मनकी खोल सुनाई ॥
राजोवाच ॥
राजा कही न बेटी मेरे । पूरे वचन करूं जो तेरे ॥
एक हुती सो खाई काला । मरी गई छूटो जंजाला ॥
उद्दालक उवाच ॥
उद्दालक कहो सुनौ हमारी । अबलग जीवत सुता तुम्हारी ॥
रघुरुवाच ॥
राजा चौंक कही मुसकाई । वह कन्या कित है ऋषिराई ॥
मोहिं दीखत अचरजसी बाता । यहतुमबोलकह्योकुसलाता २३
उद्दालकउवाच ॥ दोहा ॥
ऋषिने कह्यो चन्द्रावती, मेरे आश्रम माहिं ।
सुत समेत वहां छोड़कर, मैं आयो इहिं ठाहिं ॥२४॥
चौपाई ॥
अज्ञा वचन जु पूरे भये । जो हमकूं उन आगे कहे ॥

: नासकेतलीलावर्णन । ५८१
कहा कि पहिले बेटा पैहै । जिंह पाछै नारी हू अह है ॥
ऋषिने पिछली कही समझाई । आदि अन्तलों सबै सुनाई ॥
वंश हेत ब्रह्मा पै धायो । विधिने ऐसे बचन सुनायो ॥
पहिले पुत्तर पाछे तिरिया । तेरे भागन में यों धरिया ॥
यों कहि अन्तरध्यान विचारा । मैं निज अस्थलआन संभारा ॥
फिर रहकर तपही आराधा । मनमें रहै वासना व्याधा ॥
ताते बीज टरा कर लीना । ताकूं पदम माहिं धरदीना ॥
कुशालपेटी गंग बहाया । तो कन्या न्हाती हां आया ॥
वाकूं सूंघा कर में लया । बीज चढ़ा गर्भ होही गया ॥
नासा द्वार जनम जिन लीया । नासहीकेत नांव धरदीया ॥
कर कर कन्या क्रोध बहाया । ऐसे पुत्तर पहिले आया ॥
फिर वह वाकूं ढूंढ़न धाई । ऐसे मो अस्थल में आई ॥
ब्रह्मा बचन न टारे टरै । कोटि उपाव जु प्रानी करै ॥
ऋषि मुनि देवत दैयत सारे । समरथ कौन जु वाकूं टारे ॥
उद्दालक सब खोल सुनाई । रनजीतकहें राजामनआई २५
वैशंपायनउवाच ॥ दोहा ॥
तिस उप्रान्त जु भूप कूं, अचरज भयो हुलास ।
फिर उठकै महलों गया, रानी ही के पास ॥२६॥
चौपाई ॥
खुशी खुशी रानी सूं बोला । ऋषिका कहा सभी जो खोला ॥
रानी सांच मानियो सोऊ । ब्रह्मा बचन जु पूरे होऊ ॥
सुन रानी हियरे हुलसाई । अरु आपस में बात सुनाई ॥
राजा निकस द्वार फिर आया । उद्दालक कूं निकट बुलाया ॥
भक्ति सहित हँसकर यों बोला । बचन प्रीत के कहे अमोला ॥
सुन्दर रथ अरु सेवक मेरे । लेजा अपने संग सवेरे ॥

५८२ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
चन्द्रवती अरु बालक ल्यावो । ऐसे कही सिताबी आवो ॥
ऋषि सुन बचन खुशी जो भया । रथ सेवक ले अस्थल गया २७
दोहा ॥
रैन रहे अस्थान पर, गवन बिचारा भोर ।
दोनों रथ बैठाय कर, चाला वाही ओर ॥२८॥
चौपाई ॥
चला चला राजा पै आया । राजा देख बहुत सुख पाया ॥
राजा रघु अरु उसी की रानी । दोनोंने मिल सुता पिछानी २९
दोहा ॥
रोकर जब माता मिली, लीन्हीं कंठ लगाय ।
अरु नारी परवार की, सभी मिली जो आय ॥३०॥
चौपाई ॥
जब पण्डित कूं लिया बुलाई । साहा काढ लगन धरवाई ॥
किया विवाह दान बहु दीना । कपड़े गहने सेज नवीना ॥
दासी दासे दीने साथी । रथ घोड़े करहे अरु हाथी ॥
सोने मंढ़े सींग दई गइया । दूध भरी जो भैंसें दइया ॥
अरु बहु भांती दीने दाना । दीनी भौम बहुत सुखमाना ॥
बिदा करत जोरे दोउ हाथा । बिनती करी जु पिरथीनाथा ॥
नमस्कार कर ठाढ़ो भयो । जब ऋषि हंसकर ऐसे कह्यो ॥
कही उद्दालक सुनहो राजा । हस्ती घोड़े हम कहा काजा ॥
गहने कपड़े हम कहा करिहैं । इतना दान कहां ले धरि हैं ॥
सकल दहेज दिया ऋषि फेरी । एक न राखा चेरा चेरी ॥
चरनदास कहैं कछू न लीया । उलटा सभी फेर जो दीया ३१
दोहा ॥
नासकेत चन्द्रावती, बैठा कर रथ माहिं ।

नासकेतलीलावर्णन । ५८३
दोनों ही कूं ले गया, अपने आश्रम ठाहिं ॥ ३२ ॥
चौपाई ॥
तब हां सुख सों रहने लागे । सरसनेह में तीनों पागे ॥
रनजीत कहैं यह कथा पुरानी । जाकीमहिमा ऋषिन बखानी ॥
मनुष देवता पंडित गावै । धरमनीक सुनकर हुलसावै ॥
जित जित और पुरानन गाई । पाप मिटावन अरु सुखदाई ॥
ानरी धरमकी नवका जानौं । सुन्दर अधिक पवित्र मानौं ॥
भक्ति भावकर सुनैं जु कोई । भव जल पार उतर है सोई ३३
इति श्रीनासकेतोपाख्याने चन्द्रावतीविवाहो नाम
चतुर्थोऽध्याय ॥ ४ ॥
वैशंपायनउवाच ॥
दोहा ॥
वैशंपायन ने कहा, सुन जनमेजय भूप ।
तप करते ऋषि ने दिया, सुत कूं श्राप अनूप ॥ १ ॥
कहा कि जा जमलोक कूं, भारी कीया पाप ।
नासकेत लिया मानकै, उद्दालक का श्राप ॥ २ ॥
जनमेजयउवाच ॥
फिर जनमेजय पूछिया, हे बिप्पर सुन लेह ।
सुत कूं दीया श्राप क्यों, मोमन यह संदेह ॥ ३ ॥
सुतकूं दैना श्राप जो, दुर्ल्लभ सी यह बात ।
ऊपर अपनी आतमा, कैसे सोहै घात ॥ ४ ॥
चौपाई ॥
कौन प्रयोजन दिया सरापी । कैसे गया जमपुरी आपी ॥
कैसे देख देख सब आया । मोसौं सबही कहो सुनाया ॥
किसा नरक है जित दुख दावैं । किसा स्वर्ग है जहां सुख पावैं ॥
३९

५८४ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
वैशंपायनउवाच ॥
बोले बैशम सुनहो राजा । दिया सराप जौनही काजा ॥
जाकर हां सूं आया जैसे । चित दे सुनौ कहूं अब तैसे ॥
एक दिना उदालक राया । नासकेत कूँ वचन सुनाया ॥
मैं रहूं घर तुम बनकूं जावो । कन्द फूल फल लकड़ी लावो ॥
अगनहोत्र जासूँ हम करि हैं। शुभ करमों के कारज सरिहैं ॥
पिता की आज्ञा लेकर धाये । चले चले बन माहीं आए ॥
जिन हां एक सरोवर देखा । कंवल भरे ता माहिं बसेखा ॥
आसपास द्रुम हैं बहु भांती । फूले फले सुगन्ध सुहाती ॥
नाना पंछी बोलें बानी । सुन्दर ठोर देख मन मानी ॥
जित हां विधसूँ करि अस्नाना । देवत पित्तर पूजन ठाना ॥
दोहा ॥
नईवेद फल फूलसों, जिनक परसन कीन ।
रनजीता यों कहत है, अंजली सों जलदीन ॥ ६ ॥
फिर यों मन में आइया, बैठ धरूं हरि ध्यान ।
आराधन प्रभु को करूं, ऐसो उपजो ज्ञान ॥ ७ ॥
चौपाई ॥
तहां बैठ कर आसन कीनो । हरिके ध्यान माहिं मन दीनो ॥
जोग ध्यान की जुगत विचारी । सुरत लीन भई लागी ताडी ॥
दो अरु तीसदिना यो रही । बहुरु आप सहज खुलगई ॥
जबही घरकी चिंता आई । पिता की आज्ञा चितमें छाई ॥
तातें बेग चला हां आया । देख पिता कूं सीस नवाया ॥
देख पिता पुत्तर की ओरी । बचन क्रोध कहा वा ठोरी ॥
अगनहोत्र में विघ्न भया था । यातें बचन कठोर कहा था ॥

नासकेतलीलावर्णन । ५८५
रे पापी तू कित सूं आया । मेरा आयसु सभी भुलाया ॥
मैं भेजा फल फूल ही काजे । अग्निहोत्र के करने साजे ॥
अग्निहोत्रका तैं किया नासां । वा दिन मोमन रहा उदासा ॥८॥
दोहा ॥
अग्निहोत्र है देवता, परसन ब्रह्मा आदि ।
पितर मुनि तिरपत भवें, सुखदाई धर्मादि ॥६॥
बचन पिताके सुनलिए, बोले नासही केत ।
समझावत हो जो अबै, पुत्तरही के हेत ॥१०॥
नासकेत उवाच ॥ चौपाई ॥
सुनो पिता यह जानो दाई । अग्निहोत्र बंधन जगमाहीं ॥
जनम मरन के भय का दाता । सुख का नास करन ए बाता ॥
जोग समान और कछु नाहीं । जग समुद्र जासूं तिरजाई ॥
ब्रह्मा इंदर आदिक देवा । जोगही करिकै यह सिध लेवा ॥
सिद्ध होन का ऐसा कोई । और उपाव न दूजा होई ॥
उद्दालक उवाच ॥
हे पुत्तर ऋषि बड़े निहारे । अधिक तपस्या करनेवारे ॥
तिनहूं अग्निहोत्र कूँ धारा । जान पवित्र हिये मँझारा ॥
ऐसे वेदमाहिं लिख राखा । रनजीत कहैं उद्दालक भाखा ॥११॥
दोहा ॥
अग्निहोत्रही के बिना, ब्रह्म जज्ञ नहिं होय ।
अति पुनीत यह करमहै, करो चाव सो सोय ।
नासकेत उवाच ॥ चौपाई ॥
नासकेत कहै बचन हमारे । सुनो पिताजी कहूं विचारे ॥
अग्निहोत्र कर सुरग सिधारै । फेर जन्म पिरथी पर धारै ॥

५८६ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
• करमोंही से आवै जावै । विना जोग नहिं थिरता पावै ॥
पाप पुण्य दोऊ बेड़ी पग मैं । इन कूं तोड़ चलै हरि मग मैं ॥
भक्ति जोग अरु निर्मल ज्ञानो ।इनसूं मुक्ति होय सतजानो ॥
तीनों में सरधा सोई करै । निहचै भवसागर सूं तरै ॥
वास लहै चौथे पद माहीं । जनम मरन फिर होवे नाहीं ॥
कर्म करै अरु फल कूं चाहै । मुक्ति न पावै दुख सुख दाहै॥१३॥
वैशंपायन उवाच ॥ दोहा ॥
वैशंपायन कहत है, सुन जनमेजय भूप ।
उद्दालक सुन बचन सूं, भया तमोगुन रूप ॥ १४ ॥
चौपाई ॥
अरु मुखसों कहि पापी दोखी । तैने खोटी कही अनोखी ॥
है जु पिता का दूषक भारी । वेग जाउ जमलोक मँझारी ॥
ब्रह्म दण्ड तू मारा गया । तू जमलोक जोगहीं भया ॥
फिर सुनकर वह नासहिकेता । बड़े श्राप भू गिरा अचेता ॥
फिर चेतन होय ऐसें भाखा । पिता श्राप सीस पर राखा ॥
जाऊंगा जमलोक अवारूं । तुम्हरी आज्ञा कबहु न टारूं ॥
गिरापुत्तरकूं मुनि जबदेखा । ऋषिब्याकुल भया अधिकबिशेखा ॥
शोक घने सूं तपत भया है । बहु विलाप दुख घना ल्याहै॥१५॥
दोहा ॥
हाय पुत्र मम आतमा, मैं तोहिं दीनों श्राप ।
मैं क्रोधी अज्ञान हूं, लिया ढांप मोहिं पाप ॥१६॥
चौपाई ॥
हे पुत्तर धर्मराय जहां है । मारग दारुण दुःख तहां है ॥
और नरक हां है भयमाना । वैसी ठौर न तोकूं जाना ॥
छोटा बालक डर हां भारी । दुख भुगतत हैं नर अरु नारी ॥

नासकेतलीलावर्णन । ५८७
मोकूं अरु अपनी माताकूं । हमें छोड़ के ह्वां मत जातू ॥
ऐसे वचन पिता जब बोले । नासही केत दीन हो बोले ॥
नांसकेत उवाच ॥
एहो पिता डिगा मत मोकूं । नमस्कार बहुते करूं तोकूं ॥
ध्यान तुम्हारो हिरदै धरि हूं । वचन तुम्हारे कूं सब करिहूं ॥
सत से सूरज तपता मानौं । सतसूं पिरथी कूं थिर जानौं ॥
सतसूं अगन जलत है सोई । सतसूं चन्दा अस्थित होई ॥
सतसूं लोक रहत ठहराई । सतसूं धर्म सदा बिरधाई ॥
सतसूं यह ब्रह्माण्ड खड़ा है । सत सूं सत्ती सूर अड़ा है ॥
हे महाराज साख कहूं एका । एक समय विधि कियो विवेका ॥
अश्वमेध यज्ञ सहस्रु लीने । इक पलड़े में राख जु दीने ॥
दूजे पलड़े में सत राखा । भारी भया सांच यह साखा ॥१७॥
दोहा ॥
यज्ञ पलड़ा ऊंचे गया, सत पलड़ा रहा भार ।
सत करिकै जो रहत नर, सोमसान सम धार ॥१८॥
ज्यों मसान तज दीजिए, वा नर कूं यों त्याग ।
सत्य जतन कर राखिये, सतही सेती लाग ॥१९॥
स्वर्ग सत्तसूं पाइये, सतही सों गति होय ।
सत्य धर्म सें हीन नर, जाहि नरककूँसोय ॥२०॥
तातें शोक निवारिये, बुधकों थिर कर लेहु ।
मैं जाऊं जमलोक कँ, येहि जु आज्ञा देहु ॥२१॥
ठौर ठौर कूं देखकर, आऊं चरनों पास ।
बेगहि आ दरशन करूं, मतहो नेक उदास ॥२२॥
वैशंपायन उवाच ॥
वैशंपायन कहत है, हे राजा सुज्ञान ।

५८८ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
नासकेत कहि पिता सूं, फिर भया अन्तर ध्यान ॥२३॥
चौपाई ॥
इतनी कहि फिर गवन विचारा । गया जोग वल लगी न वारा ॥
ऐसे जमके लोक पधारा । धरमराय का दरस निहारा ॥
सिंघासन के ऊपर राजे । अगन पुंज ज्यों तेज विराजै ॥
जव इन हाथ जोड़ दोउ लीया । अस्तोत्तरधर्मराय का कीया ॥
भक्ति भावकर जुक्ति संभारै । लिये दीनता लज्जा धारै ॥
धरम नीक परवीन महाई । रनजीत कहै तिरलोक वड़ाई ॥२४॥
इति श्रीनासकेतोपाख्याने यमदर्शनो नाम पञ्चमोऽध्यायः ॥ ५ ॥
वैशंपायन उवाच ॥ दोहा ॥
पैठि सभा के बीच में, दीठ वुद्धि उद्धार ।
पण्डित वहुत विराजई, विद्या का उजियार ॥ १ ॥
सारदूल से भूप सुनि, वालक कियो वनाय ।
अस्तोत्तर धर्मरायका, सो अव कहूं सुनाय ॥ २ ॥
नासकेत उवाच ॥
नमस्कार धर्मराय कूं, सर्व पिता महिदेव ।
तीत लोक रक्षा करन, सकल हरन निरलेव ॥ ३ ॥
सूरज सुत मरजाद धरि, नीति शास्त्र के रूप ।
धर्म अधर्म विचार कै, न्याई अधिक अनूप ॥ ४ ॥
सव पित्रों के नाथ हो, पूजैं सव सुर आदि ।
वुद्धिमान धर्मात्मा, सतवादी विन वाद ॥ ५ ॥
क्रांन्त वड़ी अरु निर्मला, महा पवित्तर देह ।
परजाओं के पति वड़े, नमस्कार मम लेह ॥ ६ ॥
अधिकारी धर्म ध्यान के, लक्ष्मीवान सुजान ।
नमस्कार मम लीजिए, वहुरूपी वहु ज्ञान ॥ ७ ॥

नासकेतलीलावर्णन । ५८६
नमस्कार मम लीजिए, पाप मिटावन हार ।
बेल बढ़ावन धर्म के, अस्तुति बारम्बार ॥ ८ ॥
वैशंपायन उवाच ॥
वैशंपायन ने कहा, सुन राजा यह शिक्ष ।
अस्तोत्तर ऋषिसुत कियो, पापदहन परतिक्ष ॥ ६ ॥
यह अस्तोत्तर सुन खुसी, बोला धर्महि राय ।
हे ब्राह्मण परसन भयो, पूछत हूं हरषाय ॥१०॥
क्यों कर आया कहां सूं, कै किन दिया पठाय ।
कै तू आया आपसूं, हम कूं कहो सुनाय ॥११॥
चौपाई ॥
जब यों पूछा धर्महि राया। रे बालक तू ह्यां कित आया ॥
बिना बुलाये ना कोइ आवे। अरु अपनी देह नहिं लावे १२
नासकेत उवाच ॥ दोहा ॥
नासकेत ऐसे कही, दीनों पिता सराप ।
अब तू जा जमलोक कूं, यों मैं आयो आप ॥१३॥
चौपाई ॥
पिता सराप आपही आयो। तुम्हरे दरशन कर सुख पायो ॥
यम उवाच ॥
धरमराय सुन बचन उचारा । धनधन बालक परन तुम्हारा ॥
आज्ञा मान पिता की आए। हम तुमपै बहुतै हरषाए ॥
हे बुधिमान कहा तोहि चहिए । मनमें हो सो हमसों कहिए ॥
सुखसों बिचर जमपुरी माहीं । बरमाँगे सो ले अब ह्याहीं ॥
नासकेत उवाच ॥
अहो देव तू परसन मोपै। तो इक बर मांगूं मैं तोपै ॥
सुन्दर नगर तुम्हारा कैसा। सभी दिखावो जित जित जैसा॥

५६० श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
चित्रगुपत कूं मोहिं मिलावो। ह्यांका सबही भेद जनावो ॥१४॥
दोहा ॥
पतितन कूं दुख होत है, धरमी सुख निवास ।
एहू ठौर दिखाइए, मैं चरणन को दास ॥१५॥
चौपाई ॥
तिह उपरान्त धरमही राया । किंकर अपना कूं जु सुनाया ॥
या बालक कूं संग ले जावो । चित्रगुपत ही कूं जु मिलावो ॥
यह ब्राह्मण है पण्डित भारा । सत्त धर्म का जानन वारा ॥
श्राप पिता के ह्यां चलि आया । याको नगरी देहु दिखाया ॥
चित्रगुप्त कूं याजा दीज्यो । मेरी अज्ञा सूं यों कीज्यो ॥
वैशंपायन उवाच ॥
ऐसे दूतन सों कहि दीया । नासकेत को जब संग लीया ॥
चित्रगुप्त के जाके द्वारे । द्वारपाल सों वचन उचारे ॥
दूत उवाच ॥
धर्मराय ने हमें खंदाया । नासकेत कूं संग पठाया ॥१६॥
दोहा ॥
चित्रगुप्त के पास ही, जाय कहो यह बोल ।
सुनकर गए सिताबही, बात कही सब खोल ॥१७॥
चौपाई ॥
चित्रगुप्त सुनिये महाराजा । धर्मराय भेजे इस-काजा ॥
इक ब्राह्मण कों संग पठाया । दूतन साथ पोलि पै आया ॥
चित्रगुप्त उवाच ॥
पूछो जाय सिताबी वाकों । कै भीतर ले आवो ताकों ॥
वैशंपायन उवाच ॥
द्वारपाल सब कूं ले गया । चित्रगुप्त का दरशन भया ॥

नासकेतलीलावर्णन । ५६१
चित्रगुप्त दूतन सों पूछा । तबही दूत बचन कहे गूछा ॥
दूत उवाच ॥
हे बड़भाग सुनौ करि दाया । धरमराय ने हमें पठाया ॥
यह ब्राह्मण आया बुधिव्राना । सत्य धर्म में दृढ अति स्याना ॥
पिता सराप जमपुरी आया । याका चाव करो मन भाया ॥१८॥
चित्रगुप्त उवाच ॥ दोहा ॥
चित्रगुप्त जो बोलिया, सुन ब्राह्मण महाराज ।
तो इच्छा पूरी करूं, खोल कहो अब काज ॥१६॥
नासकेत उवाच ॥
जानत हो सब नरन की, गुप्त प्रगट जो बात ।
कछू नहीं तुम सूं छिपा, द्योस करो कै रात ॥२०॥
तेजवंत प्राकर्म ही, बड़े तुम्हारे काज ।
देखा चाहूं जमपुरी, अरु सब ह्यां के साज ॥२१॥
चौपाई ॥
अरु इक मनकी खोल सुनाऊं । दुख सुख ह्यां के देखा चाहूं ॥
चित्रगुप्त उवाच ॥
धरमराय को बचन हमारो । हे दूतो तुम हिरदै धारो ॥
ठौर ठौर सब जाय दिखावो । संगहि रहो फेर ह्यां ल्यावो ॥
इसे नरक दुख पवन न लागे । रक्षा सो ले जाहु सुभागे ॥
वैशंपायन उवाच ॥
चित्रगुप्त की आज्ञा पाई । सगरी नगरी जाय दिखाई ॥
नासकेत देखतही जाई । ठौर ठौर देखी हित लाई ॥
सात स्वरग अरु नरक अठारा । भिन्न भिन्न कर देखा सारा ॥
सब दिखाय फिर लाये पासा । नमस्कार कर होय हुलासा ॥२२॥

५६२ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
चित्रगुप्त उवाच ॥ दोहा ॥
चित्रगुप्त कही दूतसों, पूरी भई जु आस।
अब याकूं ले जाइए, धरमराय के पास॥ २३ ॥
सुनकै तुरतही लेगए, नमस्कार करि जाय।
धर्मराय वा देखकै, बोले अधिकी भाय ॥ २४ ॥
आधा आसनही दिया, बैठाया कर चाव।
चरन धोय पूजाकरी, जान किया ऋषि भाव ॥२५॥
यम उवाच ॥ चौपाई ॥
धरमराय हँस बचन सुनाए। सभी देख कहो सुख सूं आये ॥
नासकेतजी ठौर निहारी। तुमने देखी नगरी सारी ॥
नासकेत उवाच ॥
तुम किरपा सों स्वर्ग निहारे। अरु हम देखे नरक अठारे ॥
पापी पुन्यो सब हां देखे। अरु उनके फल सभी बिसेखे ॥
अबइक अरज़ और सुन लीजे। घर जाने की आज्ञा दीजे ॥
माता दुखी पिता दुख भारूं। जाय मिलूं दुख सबही टारूं ॥
उनसूं बचन किया था आगूं। देख जमपुरी चरनों लागूं॥२६॥
दोहा ॥
नमस्कार कर यों कही, देखो सबही भेव।
अब मात पिता पै जायहूं, मोकूं आयसु देव॥ २७॥
यम उवाच ॥ चौपाई ॥
धर्मराय कही आछी बाता। बचन कहो यह मोहिं सुहाता ॥
अब हम तोकूं यह वर दीना। होगा अमर सदा परबीना ॥
अरु काया बूढ़ी नहि होगी। हमरे बरतैं रहै निरोगी ॥

नासकेतलीलावर्णन । ५६३
वैशंपायनउवाच ॥
नासकेत बर ले सिर नाया । मातपिताढिंग बेगही आया ॥
चला जोगबल लगी न बारा । एक पलक में जैसे तारा ॥
रोवत माता कूं जहां पाया । पिता शोक में था अधिकाया ॥
पुत्तर कूं जब आया देखा । उद्दालक भया खुशी विशेखा ॥
पिता और चन्द्रावति माई । हरष मान बहुकरी बधाई ॥२८॥
उद्दालकउवाच ॥
दोहा ॥
जनम करम पूजा सभी, सुफल भए मम आज ।
पुत्तर का मुख देखतें, सभी गए दुख भाज ॥ २६ ॥
चौपाई ॥
उद्दालक कह्यो वाकी मासूं । देख जमपुरी आया हां सूं ॥
जोग तपस्या बल कूँ देखो । अपने मन में कर कर लेखो ॥
जमपुर गया देख अरु आया । हांका भेद सभी जो लाया ॥
यों कहि नासकेत कों ताका । पूंछूं बरनन करि सब वाका ॥
किसी जमपुरी देखी कैसे । कैसा मारग आया जैसे ॥
कैसा देखा वह जमराया । कहापिया अरु क्यातुमखाया ॥
जो जो देखा सो अब कहिये । हमसे सभी कहा जो चहिये ॥
नंरक माहिं दुख कैसे कैसे । सुरग माहिंसुख जैसे जैसे ॥३०॥
दोहा ॥
अपनी आंखों देखकर, तुम आये या ठौर ।
सुन सुनकै जानत हुते, सभी ऋषिश्वर और ॥३१॥
नासकेतउवाच ॥
चौपाई ॥
नासकेत जोरे दोऊ हाथा । कहने लागे हांकी बाता ॥