भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें५८० श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
चरनों सिर धरि यों कहा, कृपा करी तुम आय ॥२२॥
उद्दालकउवाच ॥ चौपाई ॥
उद्दालक कहो बचन अनूपा । देखे पिरथी पर बहुभूपा ॥
तो सम राजा और न दूजो । तेरी वड़ी आरवल हूजो ॥
राजोवाच ॥
हाथ जोरकर पूछी बाता । किह कारन आये तुम नाथा ॥
मनमें हो सो अज्ञा दीजै । वही कामना हमसूं लीजै ॥
उद्दालकउवाच ॥
ऐ राजा मोहिं कछू न चहिये । सभी त्याग जंगल में रहिये ॥
मैं आयो यह इच्छा मेरी । कन्या मांगन आयों तेरी ॥
वंस वढ़ावनही के काजा । मोसे सुनों सांच यह राजा ॥
जाकूं दीजे मोहि परनाई । अपने मनकी खोल सुनाई ॥
राजोवाच ॥
राजा कही न बेटी मेरे । पूरे वचन करूं जो तेरे ॥
एक हुती सो खाई काला । मरी गई छूटो जंजाला ॥
उद्दालक उवाच ॥
उद्दालक कहो सुनौ हमारी । अबलग जीवत सुता तुम्हारी ॥
रघुरुवाच ॥
राजा चौंक कही मुसकाई । वह कन्या कित है ऋषिराई ॥
मोहिं दीखत अचरजसी बाता । यहतुमबोलकह्योकुसलाता २३
उद्दालकउवाच ॥ दोहा ॥
ऋषिने कह्यो चन्द्रावती, मेरे आश्रम माहिं ।
सुत समेत वहां छोड़कर, मैं आयो इहिं ठाहिं ॥२४॥
चौपाई ॥
अज्ञा वचन जु पूरे भये । जो हमकूं उन आगे कहे ॥