भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
पृष्ठ 617, कुल 690 में से
संदर्भ में पढ़ें५७४ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ।
उपजा वाके बीरज सेती। कही सांच मानियो जेती॥
बालक बचन सुने जब माई। वह बहुती अचरज में आई॥१७॥
दोहा॥
जबै मोह बश होय कै, गोदी लिया उठाय।
फिर मुख में अस्तन दियो, खुशी भई अधिकाय ॥ १८॥
चौपाई॥
बालक शोभा कहा बखानूं। रूपवंत अरु धुर सूं ज्ञानूं॥
ऋषि के आश्रमही के माहीं। पालन लगी जिसी के ताईं ॥
लज्या दुख लियें रहै सुभागा। इकदिन बालक रोवनलागा॥
थांभा थमै न क्योंही कैसे। कीया क्रोध सुभांगी जैसे॥
हे पुत्तर रोवत क्यों भारी। तोही कारन बनमें डारी॥
वैशंपायनउवाच ॥
हूवा था जब एक बरस का। रूपवंत गुणवंत सरस का॥
क्रोध सहित माता मन आई। वहीं पिटारी एक बनाई॥
तामें बालक कूं पौढ़ाया। कुशाघासतापै लिपटाया॥१६॥
[दोहा॥
गही पिटारी आयकर, गंगा दिया बहाय।
तब कन्या उस पुत्रकूं, ऐसे कहा सुनाय॥२०॥
चौपाई॥
कौन गरभ का मैं नहीं जानूं। तेरे पिताकूं मैं न पिछानूं॥
जाके बीरज भया उपाधू। ताही के ढिग बहकर जातू॥
जब बालक वह बहता चला। आगे सुन होतबकी कला॥
बालक आया बहते बहते। जहां ऋषेश्वर बहुतक रहते॥
उद्दालक रहता था हांही। तेजवन्त तपसी अधिकाई॥
लखी पिटारी आवत सबही। पर लीनी उद्दालक तबेही॥