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सर्वकोश
भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)

भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)

Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas

सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished690 पृष्ठ

पृष्ठ 634, कुल 690 में से

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पृष्ठ 634

नासकेतलीलावर्णन । ५६१
चित्रगुप्त दूतन सों पूछा । तबही दूत बचन कहे गूछा ॥
दूत उवाच ॥
हे बड़भाग सुनौ करि दाया । धरमराय ने हमें पठाया ॥
यह ब्राह्मण आया बुधिव्राना । सत्य धर्म में दृढ अति स्याना ॥
पिता सराप जमपुरी आया । याका चाव करो मन भाया ॥१८॥
चित्रगुप्त उवाच ॥ दोहा ॥
चित्रगुप्त जो बोलिया, सुन ब्राह्मण महाराज ।
तो इच्छा पूरी करूं, खोल कहो अब काज ॥१६॥
नासकेत उवाच ॥
जानत हो सब नरन की, गुप्त प्रगट जो बात ।
कछू नहीं तुम सूं छिपा, द्योस करो कै रात ॥२०॥
तेजवंत प्राकर्म ही, बड़े तुम्हारे काज ।
देखा चाहूं जमपुरी, अरु सब ह्यां के साज ॥२१॥
चौपाई ॥
अरु इक मनकी खोल सुनाऊं । दुख सुख ह्यां के देखा चाहूं ॥
चित्रगुप्त उवाच ॥
धरमराय को बचन हमारो । हे दूतो तुम हिरदै धारो ॥
ठौर ठौर सब जाय दिखावो । संगहि रहो फेर ह्यां ल्यावो ॥
इसे नरक दुख पवन न लागे । रक्षा सो ले जाहु सुभागे ॥
वैशंपायन उवाच ॥
चित्रगुप्त की आज्ञा पाई । सगरी नगरी जाय दिखाई ॥
नासकेत देखतही जाई । ठौर ठौर देखी हित लाई ॥
सात स्वरग अरु नरक अठारा । भिन्न भिन्न कर देखा सारा ॥
सब दिखाय फिर लाये पासा । नमस्कार कर होय हुलासा ॥२२॥