भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
पृष्ठ 619, कुल 690 में से
संदर्भ में पढ़ें५७६ : श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
नासकेतउवाच ॥
जब बालक कही पिता हमारे । आज्ञा दे वन ओर सिधारे ॥
तातें लीपतहूं जज्ञसाला । आय करें जज्ञ वै मधकाला ॥
मातोवाच ॥
कन्या कही पुत्र तुम मेरे । ला मैं लींपूं बदले तेरे ॥
जब बालक लीपन नहिं कीन्हा । सकल सौंज माता कर दीन्हा ॥
चित्त दे लीपा सुन्दर बाला । और दिना सूं नीकी शाला ॥
चरणदास कहै फुल्लित भई । गंगा न्हान करन कूं गई ॥३॥
दोहा ॥
तब उद्दालक आइया, बनते अपनी ठाहिं ।
बालक सों धन धन कहा, खुशी भये मन माहिं ॥ ४ ॥
उद्दालकउवाच ॥
पुत्तर झाडू भलीदे, लीपन किया बनाय ।
अगन होत्रका मंडही, नई भांति दरसाय ॥ ४ ॥
बहुत खुशी तौपै भया, सुन्दर मन्दिर देख ।
ऐसा लीपाना कभी, जैसा आज बसेख ॥ ६ ॥
नासकेतउवाच ॥
पिता सुनौ लीपन करम, मैं नहिं कीया आज ।
मेरी माता आइया, जिन यह कीया काज ॥ ७ ॥
उद्दालकउवाच ॥
चौपाई ॥
हे पुत्तर तेरी जो माई । कारज करिके कितकूं धाई ॥
नासकेत सुनि ऐसे कही । गंगा ओर न्हान कूं गई ॥
सुन यह बचन खुशी ऋषि भयऊ । बहुरूं अगन होत्र चित्तदियऊ॥
करि करि करमजु बोलत भया । पुत्तर का कर कर मैं लिया ॥
फिर वासुं कही गंगा जावो । अपनी माता कूं ले आवो ॥