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सर्वकोश
भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)

भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)

Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas

सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished690 पृष्ठ

पृष्ठ 628, कुल 690 में से

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पृष्ठ 628

नासकेतलीलावर्णन । ५८५
रे पापी तू कित सूं आया । मेरा आयसु सभी भुलाया ॥
मैं भेजा फल फूल ही काजे । अग्निहोत्र के करने साजे ॥
अग्निहोत्रका तैं किया नासां । वा दिन मोमन रहा उदासा ॥८॥
दोहा ॥
अग्निहोत्र है देवता, परसन ब्रह्मा आदि ।
पितर मुनि तिरपत भवें, सुखदाई धर्मादि ॥६॥
बचन पिताके सुनलिए, बोले नासही केत ।
समझावत हो जो अबै, पुत्तरही के हेत ॥१०॥
नासकेत उवाच ॥ चौपाई ॥
सुनो पिता यह जानो दाई । अग्निहोत्र बंधन जगमाहीं ॥
जनम मरन के भय का दाता । सुख का नास करन ए बाता ॥
जोग समान और कछु नाहीं । जग समुद्र जासूं तिरजाई ॥
ब्रह्मा इंदर आदिक देवा । जोगही करिकै यह सिध लेवा ॥
सिद्ध होन का ऐसा कोई । और उपाव न दूजा होई ॥
उद्दालक उवाच ॥
हे पुत्तर ऋषि बड़े निहारे । अधिक तपस्या करनेवारे ॥
तिनहूं अग्निहोत्र कूँ धारा । जान पवित्र हिये मँझारा ॥
ऐसे वेदमाहिं लिख राखा । रनजीत कहैं उद्दालक भाखा ॥११॥
दोहा ॥
अग्निहोत्रही के बिना, ब्रह्म जज्ञ नहिं होय ।
अति पुनीत यह करमहै, करो चाव सो सोय ।
नासकेत उवाच ॥ चौपाई ॥
नासकेत कहै बचन हमारे । सुनो पिताजी कहूं विचारे ॥
अग्निहोत्र कर सुरग सिधारै । फेर जन्म पिरथी पर धारै ॥

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