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सर्वकोश
भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)

भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)

Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas

सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished690 पृष्ठ

पृष्ठ 626, कुल 690 में से

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पृष्ठ 626

नासकेतलीलावर्णन । ५८३
दोनों ही कूं ले गया, अपने आश्रम ठाहिं ॥ ३२ ॥
चौपाई ॥
तब हां सुख सों रहने लागे । सरसनेह में तीनों पागे ॥
रनजीत कहैं यह कथा पुरानी । जाकीमहिमा ऋषिन बखानी ॥
मनुष देवता पंडित गावै । धरमनीक सुनकर हुलसावै ॥
जित जित और पुरानन गाई । पाप मिटावन अरु सुखदाई ॥
ानरी धरमकी नवका जानौं । सुन्दर अधिक पवित्र मानौं ॥
भक्ति भावकर सुनैं जु कोई । भव जल पार उतर है सोई ३३
इति श्रीनासकेतोपाख्याने चन्द्रावतीविवाहो नाम
चतुर्थोऽध्याय ॥ ४ ॥
वैशंपायनउवाच ॥
दोहा ॥
वैशंपायन ने कहा, सुन जनमेजय भूप ।
तप करते ऋषि ने दिया, सुत कूं श्राप अनूप ॥ १ ॥
कहा कि जा जमलोक कूं, भारी कीया पाप ।
नासकेत लिया मानकै, उद्दालक का श्राप ॥ २ ॥
जनमेजयउवाच ॥
फिर जनमेजय पूछिया, हे बिप्पर सुन लेह ।
सुत कूं दीया श्राप क्यों, मोमन यह संदेह ॥ ३ ॥
सुतकूं दैना श्राप जो, दुर्ल्लभ सी यह बात ।
ऊपर अपनी आतमा, कैसे सोहै घात ॥ ४ ॥
चौपाई ॥
कौन प्रयोजन दिया सरापी । कैसे गया जमपुरी आपी ॥
कैसे देख देख सब आया । मोसौं सबही कहो सुनाया ॥
किसा नरक है जित दुख दावैं । किसा स्वर्ग है जहां सुख पावैं ॥
३९