भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंनासकेतलीलावर्णन । ५७५
लाकर राखी अपने ठांहीं । आप लगा शुभ कर्मों माहीं ॥
वेद करम सबही करि लीन्हें । पित्तरकारज भी सबकीन्हें॥२१॥
दोहा ॥
शुभकर्मों से छूटकर, खोला फेर पिटार ।
जो देखे तो पुरुष इक, सुन्दर अधिक अपार ॥२२॥
चौपाई ॥
गुणवन्ता अरु लक्षण धारी । ध्यान जोगमें था बलकारी ॥
उस बालक कों ऐसे लहिया । ज्ञानवान ऋषि जब यों कहिया ॥
हे बालक अब बसतू यहाँही । मेरे सुन्दर आश्रम माहीं ॥
ऐसे कहि राखा धर्मशाला । लागा बहुर करन प्रतिपाला ॥२३॥
इति श्रीनासकेतोपाख्याने पितापुत्रसंयोगोनाम
तृतीयोऽध्यायः ॥ ३ ॥
चौपाई ॥
एकदिना वाकी महतारी । गया क्रोध जब बात विचारी ॥
जिंह कारन बहुते दुखपाया । सो बालक मैं गंग बहाया ॥
सोच सोच मन में पछताई । गंगाकूल ढूंढ़ने धाई ॥
व्याकुल भई रोवती चाली । अपनी बुध कूं देती गाली ॥
चलती चलती पहुंची तहाँ । उद्दालक रहता था जहाँ ॥
तहाँ अपना बालकही पाया । भरिकै अंकौं गले लगाया ॥१॥
दोहा ॥
देख बहुत प्रसन्न हो, कही द्योस धन आज ।
ढूँढ़न कूं निकसी हुती, सो भए पूरन काज ॥ २ ॥
चौपाई ॥
यों कहि फिर बैठी वह बाला । बालकलियनलगो जज्ञसाला ॥
कन्या कही लीप कहा करिहो । को कारज या ऊपर सरिहो ॥