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सर्वकोश
भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)

भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)

Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas

सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished690 पृष्ठ

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पृष्ठ 632

नासकेतलीलावर्णन । ५८६
नमस्कार मम लीजिए, पाप मिटावन हार ।
बेल बढ़ावन धर्म के, अस्तुति बारम्बार ॥ ८ ॥
वैशंपायन उवाच ॥
वैशंपायन ने कहा, सुन राजा यह शिक्ष ।
अस्तोत्तर ऋषिसुत कियो, पापदहन परतिक्ष ॥ ६ ॥
यह अस्तोत्तर सुन खुसी, बोला धर्महि राय ।
हे ब्राह्मण परसन भयो, पूछत हूं हरषाय ॥१०॥
क्यों कर आया कहां सूं, कै किन दिया पठाय ।
कै तू आया आपसूं, हम कूं कहो सुनाय ॥११॥
चौपाई ॥
जब यों पूछा धर्महि राया। रे बालक तू ह्यां कित आया ॥
बिना बुलाये ना कोइ आवे। अरु अपनी देह नहिं लावे १२
नासकेत उवाच ॥ दोहा ॥
नासकेत ऐसे कही, दीनों पिता सराप ।
अब तू जा जमलोक कूं, यों मैं आयो आप ॥१३॥
चौपाई ॥
पिता सराप आपही आयो। तुम्हरे दरशन कर सुख पायो ॥
यम उवाच ॥
धरमराय सुन बचन उचारा । धनधन बालक परन तुम्हारा ॥
आज्ञा मान पिता की आए। हम तुमपै बहुतै हरषाए ॥
हे बुधिमान कहा तोहि चहिए । मनमें हो सो हमसों कहिए ॥
सुखसों बिचर जमपुरी माहीं । बरमाँगे सो ले अब ह्याहीं ॥
नासकेत उवाच ॥
अहो देव तू परसन मोपै। तो इक बर मांगूं मैं तोपै ॥
सुन्दर नगर तुम्हारा कैसा। सभी दिखावो जित जित जैसा॥