भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें५८२ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
चन्द्रवती अरु बालक ल्यावो । ऐसे कही सिताबी आवो ॥
ऋषि सुन बचन खुशी जो भया । रथ सेवक ले अस्थल गया २७
दोहा ॥
रैन रहे अस्थान पर, गवन बिचारा भोर ।
दोनों रथ बैठाय कर, चाला वाही ओर ॥२८॥
चौपाई ॥
चला चला राजा पै आया । राजा देख बहुत सुख पाया ॥
राजा रघु अरु उसी की रानी । दोनोंने मिल सुता पिछानी २९
दोहा ॥
रोकर जब माता मिली, लीन्हीं कंठ लगाय ।
अरु नारी परवार की, सभी मिली जो आय ॥३०॥
चौपाई ॥
जब पण्डित कूं लिया बुलाई । साहा काढ लगन धरवाई ॥
किया विवाह दान बहु दीना । कपड़े गहने सेज नवीना ॥
दासी दासे दीने साथी । रथ घोड़े करहे अरु हाथी ॥
सोने मंढ़े सींग दई गइया । दूध भरी जो भैंसें दइया ॥
अरु बहु भांती दीने दाना । दीनी भौम बहुत सुखमाना ॥
बिदा करत जोरे दोउ हाथा । बिनती करी जु पिरथीनाथा ॥
नमस्कार कर ठाढ़ो भयो । जब ऋषि हंसकर ऐसे कह्यो ॥
कही उद्दालक सुनहो राजा । हस्ती घोड़े हम कहा काजा ॥
गहने कपड़े हम कहा करिहैं । इतना दान कहां ले धरि हैं ॥
सकल दहेज दिया ऋषि फेरी । एक न राखा चेरा चेरी ॥
चरनदास कहैं कछू न लीया । उलटा सभी फेर जो दीया ३१
दोहा ॥
नासकेत चन्द्रावती, बैठा कर रथ माहिं ।