भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
पृष्ठ 627, कुल 690 में से
संदर्भ में पढ़ें५८४ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
वैशंपायनउवाच ॥
बोले बैशम सुनहो राजा । दिया सराप जौनही काजा ॥
जाकर हां सूं आया जैसे । चित दे सुनौ कहूं अब तैसे ॥
एक दिना उदालक राया । नासकेत कूँ वचन सुनाया ॥
मैं रहूं घर तुम बनकूं जावो । कन्द फूल फल लकड़ी लावो ॥
अगनहोत्र जासूँ हम करि हैं। शुभ करमों के कारज सरिहैं ॥
पिता की आज्ञा लेकर धाये । चले चले बन माहीं आए ॥
जिन हां एक सरोवर देखा । कंवल भरे ता माहिं बसेखा ॥
आसपास द्रुम हैं बहु भांती । फूले फले सुगन्ध सुहाती ॥
नाना पंछी बोलें बानी । सुन्दर ठोर देख मन मानी ॥
जित हां विधसूँ करि अस्नाना । देवत पित्तर पूजन ठाना ॥
दोहा ॥
नईवेद फल फूलसों, जिनक परसन कीन ।
रनजीता यों कहत है, अंजली सों जलदीन ॥ ६ ॥
फिर यों मन में आइया, बैठ धरूं हरि ध्यान ।
आराधन प्रभु को करूं, ऐसो उपजो ज्ञान ॥ ७ ॥
चौपाई ॥
तहां बैठ कर आसन कीनो । हरिके ध्यान माहिं मन दीनो ॥
जोग ध्यान की जुगत विचारी । सुरत लीन भई लागी ताडी ॥
दो अरु तीसदिना यो रही । बहुरु आप सहज खुलगई ॥
जबही घरकी चिंता आई । पिता की आज्ञा चितमें छाई ॥
तातें बेग चला हां आया । देख पिता कूं सीस नवाया ॥
देख पिता पुत्तर की ओरी । बचन क्रोध कहा वा ठोरी ॥
अगनहोत्र में विघ्न भया था । यातें बचन कठोर कहा था ॥