भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें५८६ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
• करमोंही से आवै जावै । विना जोग नहिं थिरता पावै ॥
पाप पुण्य दोऊ बेड़ी पग मैं । इन कूं तोड़ चलै हरि मग मैं ॥
भक्ति जोग अरु निर्मल ज्ञानो ।इनसूं मुक्ति होय सतजानो ॥
तीनों में सरधा सोई करै । निहचै भवसागर सूं तरै ॥
वास लहै चौथे पद माहीं । जनम मरन फिर होवे नाहीं ॥
कर्म करै अरु फल कूं चाहै । मुक्ति न पावै दुख सुख दाहै॥१३॥
वैशंपायन उवाच ॥ दोहा ॥
वैशंपायन कहत है, सुन जनमेजय भूप ।
उद्दालक सुन बचन सूं, भया तमोगुन रूप ॥ १४ ॥
चौपाई ॥
अरु मुखसों कहि पापी दोखी । तैने खोटी कही अनोखी ॥
है जु पिता का दूषक भारी । वेग जाउ जमलोक मँझारी ॥
ब्रह्म दण्ड तू मारा गया । तू जमलोक जोगहीं भया ॥
फिर सुनकर वह नासहिकेता । बड़े श्राप भू गिरा अचेता ॥
फिर चेतन होय ऐसें भाखा । पिता श्राप सीस पर राखा ॥
जाऊंगा जमलोक अवारूं । तुम्हरी आज्ञा कबहु न टारूं ॥
गिरापुत्तरकूं मुनि जबदेखा । ऋषिब्याकुल भया अधिकबिशेखा ॥
शोक घने सूं तपत भया है । बहु विलाप दुख घना ल्याहै॥१५॥
दोहा ॥
हाय पुत्र मम आतमा, मैं तोहिं दीनों श्राप ।
मैं क्रोधी अज्ञान हूं, लिया ढांप मोहिं पाप ॥१६॥
चौपाई ॥
हे पुत्तर धर्मराय जहां है । मारग दारुण दुःख तहां है ॥
और नरक हां है भयमाना । वैसी ठौर न तोकूं जाना ॥
छोटा बालक डर हां भारी । दुख भुगतत हैं नर अरु नारी ॥