भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें५८८ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
नासकेत कहि पिता सूं, फिर भया अन्तर ध्यान ॥२३॥
चौपाई ॥
इतनी कहि फिर गवन विचारा । गया जोग वल लगी न वारा ॥
ऐसे जमके लोक पधारा । धरमराय का दरस निहारा ॥
सिंघासन के ऊपर राजे । अगन पुंज ज्यों तेज विराजै ॥
जव इन हाथ जोड़ दोउ लीया । अस्तोत्तरधर्मराय का कीया ॥
भक्ति भावकर जुक्ति संभारै । लिये दीनता लज्जा धारै ॥
धरम नीक परवीन महाई । रनजीत कहै तिरलोक वड़ाई ॥२४॥
इति श्रीनासकेतोपाख्याने यमदर्शनो नाम पञ्चमोऽध्यायः ॥ ५ ॥
वैशंपायन उवाच ॥ दोहा ॥
पैठि सभा के बीच में, दीठ वुद्धि उद्धार ।
पण्डित वहुत विराजई, विद्या का उजियार ॥ १ ॥
सारदूल से भूप सुनि, वालक कियो वनाय ।
अस्तोत्तर धर्मरायका, सो अव कहूं सुनाय ॥ २ ॥
नासकेत उवाच ॥
नमस्कार धर्मराय कूं, सर्व पिता महिदेव ।
तीत लोक रक्षा करन, सकल हरन निरलेव ॥ ३ ॥
सूरज सुत मरजाद धरि, नीति शास्त्र के रूप ।
धर्म अधर्म विचार कै, न्याई अधिक अनूप ॥ ४ ॥
सव पित्रों के नाथ हो, पूजैं सव सुर आदि ।
वुद्धिमान धर्मात्मा, सतवादी विन वाद ॥ ५ ॥
क्रांन्त वड़ी अरु निर्मला, महा पवित्तर देह ।
परजाओं के पति वड़े, नमस्कार मम लेह ॥ ६ ॥
अधिकारी धर्म ध्यान के, लक्ष्मीवान सुजान ।
नमस्कार मम लीजिए, वहुरूपी वहु ज्ञान ॥ ७ ॥