भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंनासकेतलीलावर्णन । ५७६
दोहा ॥
तभी रोस मोहि आइया, लीन्ही तुला बनाय ।
तामें तोहि सुलायकै, दीन्हों गंग बहाय ॥१८॥
चौपाई ॥
चार बरस पीछे सुध आई । बड़ी भई जब मैं पछताई ॥
जिह कारन बन लिया बसेरा । सुख छुटकै दुख हुवा घनेरा ॥
उपजा मोह क्रोध सब भागा । मन में तू बहु प्यारा लागा ॥
कलप कलप जिय रहा न जाई । तब उठ ढूंढनही कों धाई ॥
ढूंढत ढूंढत अब तोहिं पाया । आंखसुखी हुई हिया सिराया ॥
सुनरे पुत्तर यह मम बाता । जाय कहो तुम अपने ताता ॥
नासहीकेत उलट जब आया । पिताकूं सबही भेद सुनाया ॥१९॥
वैशंपायनउवाच ॥ दोहा ॥
सुनि उद्दालक हुलस मन, ब्रह्मा बचन संभार ।
चले संग ले बालका, जित चन्द्रावति नार ॥२०॥
चौपाई ॥
गये जहां बैठी बड़ भागी । मन सकुचा उठ चरनौँ लागी ॥
चरनों से दोउ नैन छुवाये । कहीं धन्य हम दरशन पाये ॥
देख ऋषीश्वर ने सुख पाया । हँस करि ऐसे बचन सुनाया ॥
चलिये रहिये सुत के पाहूं । मैं राजा रघु के ढिग जाऊं ॥
तीनौ मिल आश्रम में आये । करि भोजन सबही हुलसाये ॥
नासकेत चन्द्रावति बाला । दोनों राख चला धर्मसाला ॥
भोर भये अरु बहुत संवारा । उद्दालक ने गवन विचारा ॥
चरनदास कहै मन धरि आसा । जा पहुँचा राजारघुपासा ॥२१॥
दोहा ॥
राजा बहु आदर कियो, सिंहासन बैठाय ।