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सर्वकोश
भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)

भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)

Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas

सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished690 पृष्ठ

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पृष्ठ 633

५६० श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
चित्रगुपत कूं मोहिं मिलावो। ह्यांका सबही भेद जनावो ॥१४॥
दोहा ॥
पतितन कूं दुख होत है, धरमी सुख निवास ।
एहू ठौर दिखाइए, मैं चरणन को दास ॥१५॥
चौपाई ॥
तिह उपरान्त धरमही राया । किंकर अपना कूं जु सुनाया ॥
या बालक कूं संग ले जावो । चित्रगुपत ही कूं जु मिलावो ॥
यह ब्राह्मण है पण्डित भारा । सत्त धर्म का जानन वारा ॥
श्राप पिता के ह्यां चलि आया । याको नगरी देहु दिखाया ॥
चित्रगुप्त कूं याजा दीज्यो । मेरी अज्ञा सूं यों कीज्यो ॥
वैशंपायन उवाच ॥
ऐसे दूतन सों कहि दीया । नासकेत को जब संग लीया ॥
चित्रगुप्त के जाके द्वारे । द्वारपाल सों वचन उचारे ॥
दूत उवाच ॥
धर्मराय ने हमें खंदाया । नासकेत कूं संग पठाया ॥१६॥
दोहा ॥
चित्रगुप्त के पास ही, जाय कहो यह बोल ।
सुनकर गए सिताबही, बात कही सब खोल ॥१७॥
चौपाई ॥
चित्रगुप्त सुनिये महाराजा । धर्मराय भेजे इस-काजा ॥
इक ब्राह्मण कों संग पठाया । दूतन साथ पोलि पै आया ॥
चित्रगुप्त उवाच ॥
पूछो जाय सिताबी वाकों । कै भीतर ले आवो ताकों ॥
वैशंपायन उवाच ॥
द्वारपाल सब कूं ले गया । चित्रगुप्त का दरशन भया ॥