भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
पृष्ठ 621, कुल 690 में से
संदर्भ में पढ़ें५७८ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ।
माताउवाच ॥
दोहा ॥
चंद्रवती यों बोलिया, सुन पुत्तर परवीन ।
जो तू पूछत है मुझे, मैं कहूं चित दे चीन्ह ॥ १२॥
परालबध के जोग तें, करम भया जो जान ।
सो मैं तोसों कहत हूं, साखी इक भगवान ॥ १३ ॥
सूरज ही के वंश में, रघु राजा परसिद्ध ।
मैं हूं बेटी तासु की, शुभ करनी सब सिद्ध ॥ १४ ॥
चौपाई ॥
चूने लीपे मंदर माहीं । रहती हुती सीक कछु नाहीं ॥
दसहजार कन्या ढिग रहतीं । भांति भांनि मम सेवा करनीं ॥
एक समै मैं गंगा गई। जहां जाय कै न्हाती भई ॥
लिपटा कुशा कमल इक आया । पकड़ा खोला नाक लगाया ॥
वामें बीरज मैं नहिं जाना । नाक छेद हो उदर समाना ॥
वासों मोकूं गरभ रहा था। सखियों लखि मम मात कहा था ॥
फिर रानी राजासों कह्यो । पिता बनोबास मोहि दियो ॥
रोवन लगी बहुत दुख पाया । वहां ही एक तपस्वी आया ॥१५॥
दोहा ॥
बेटी कर धीरज दिया, लें गया आश्रम माहिं ।
ह्वां सुखसों रहने लगी, सोच रहा कछु नाहिं ॥१६॥
चौपाई ॥
हे पुत्तर उपजा तू ह्वाहीँ । नासा के मध जन्म्यों आई ॥
तातें नासकेत धरयो नाऊँ । पलने लगे बहुर वह ठाऊँ ॥
बरस दिनाके हो सुख पागे । घुटनौं पैरौं चलने लागे ॥
इक दिन रुदन किया तुम भारा । मैं किरोध करि गंगा डारा ॥१७॥