भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंनासकेतलीलावर्णन । ५६३
वैशंपायनउवाच ॥
नासकेत बर ले सिर नाया । मातपिताढिंग बेगही आया ॥
चला जोगबल लगी न बारा । एक पलक में जैसे तारा ॥
रोवत माता कूं जहां पाया । पिता शोक में था अधिकाया ॥
पुत्तर कूं जब आया देखा । उद्दालक भया खुशी विशेखा ॥
पिता और चन्द्रावति माई । हरष मान बहुकरी बधाई ॥२८॥
उद्दालकउवाच ॥
दोहा ॥
जनम करम पूजा सभी, सुफल भए मम आज ।
पुत्तर का मुख देखतें, सभी गए दुख भाज ॥ २६ ॥
चौपाई ॥
उद्दालक कह्यो वाकी मासूं । देख जमपुरी आया हां सूं ॥
जोग तपस्या बल कूँ देखो । अपने मन में कर कर लेखो ॥
जमपुर गया देख अरु आया । हांका भेद सभी जो लाया ॥
यों कहि नासकेत कों ताका । पूंछूं बरनन करि सब वाका ॥
किसी जमपुरी देखी कैसे । कैसा मारग आया जैसे ॥
कैसा देखा वह जमराया । कहापिया अरु क्यातुमखाया ॥
जो जो देखा सो अब कहिये । हमसे सभी कहा जो चहिये ॥
नंरक माहिं दुख कैसे कैसे । सुरग माहिंसुख जैसे जैसे ॥३०॥
दोहा ॥
अपनी आंखों देखकर, तुम आये या ठौर ।
सुन सुनकै जानत हुते, सभी ऋषिश्वर और ॥३१॥
नासकेतउवाच ॥
चौपाई ॥
नासकेत जोरे दोऊ हाथा । कहने लागे हांकी बाता ॥