भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें: नासकेतलीलावर्णन । ५८१
कहा कि पहिले बेटा पैहै । जिंह पाछै नारी हू अह है ॥
ऋषिने पिछली कही समझाई । आदि अन्तलों सबै सुनाई ॥
वंश हेत ब्रह्मा पै धायो । विधिने ऐसे बचन सुनायो ॥
पहिले पुत्तर पाछे तिरिया । तेरे भागन में यों धरिया ॥
यों कहि अन्तरध्यान विचारा । मैं निज अस्थलआन संभारा ॥
फिर रहकर तपही आराधा । मनमें रहै वासना व्याधा ॥
ताते बीज टरा कर लीना । ताकूं पदम माहिं धरदीना ॥
कुशालपेटी गंग बहाया । तो कन्या न्हाती हां आया ॥
वाकूं सूंघा कर में लया । बीज चढ़ा गर्भ होही गया ॥
नासा द्वार जनम जिन लीया । नासहीकेत नांव धरदीया ॥
कर कर कन्या क्रोध बहाया । ऐसे पुत्तर पहिले आया ॥
फिर वह वाकूं ढूंढ़न धाई । ऐसे मो अस्थल में आई ॥
ब्रह्मा बचन न टारे टरै । कोटि उपाव जु प्रानी करै ॥
ऋषि मुनि देवत दैयत सारे । समरथ कौन जु वाकूं टारे ॥
उद्दालक सब खोल सुनाई । रनजीतकहें राजामनआई २५
वैशंपायनउवाच ॥ दोहा ॥
तिस उप्रान्त जु भूप कूं, अचरज भयो हुलास ।
फिर उठकै महलों गया, रानी ही के पास ॥२६॥
चौपाई ॥
खुशी खुशी रानी सूं बोला । ऋषिका कहा सभी जो खोला ॥
रानी सांच मानियो सोऊ । ब्रह्मा बचन जु पूरे होऊ ॥
सुन रानी हियरे हुलसाई । अरु आपस में बात सुनाई ॥
राजा निकस द्वार फिर आया । उद्दालक कूं निकट बुलाया ॥
भक्ति सहित हँसकर यों बोला । बचन प्रीत के कहे अमोला ॥
सुन्दर रथ अरु सेवक मेरे । लेजा अपने संग सवेरे ॥