भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंनासकेतलीलावर्णन । ५७७
आदर करके परसन करूं । पुष्पमूल ले आगे धरूं ॥
बचन पिता के सुनि वहां गया । हाथ जोरि मातासों कहा ॥
नासकेतउवाच ॥
हे माता चल आश्रम माहीं । जहां मम पिता बसोतुमहाहीं ॥
कंद साग नीकै करि पावो । ऐसे सुख सूं द्योस बितावो ॥
माताउवाच ॥
सुनि चन्द्रावती कहा बिचारा । क्यों सुतबचन अजोग उचारा ॥
सुनि करि रोम उठै तन सारे । बिना धर्म का वचन कहारे ॥
आगे भी किन्हीं यह जसलीया । माता दान पुत्र ने कीया ॥८॥
दोहा ॥
जग में ऐसी रीत है, पिता करै जो दान ।
कै कन्या का भ्रातही, कै मामूं परवान ॥६॥
नासकेत चुपका भया, मन माहीं सकुचाय ।
उठ आया ऋषिपासही, सबही दिया सुनाय ॥१०॥
चौपाई ॥
हे पुत्तर उन आछी भाखी । धर्मशास्त्र में योंही राखी ॥
कहो उदालक फिर ह्वां जइए । मेरे मुखसों ऐसे कहिए ॥
कौन वंश में जन्म तुम्हारा । कैसे उपजन भया हमारा ॥
कौन काजकों तुम यहां आई । यह सब बातें पूछो जाई ॥
बचन पिता के सुन वह धाया । माता कूं जा शीश नवाया ॥
नासकेतउवाच ॥
फेर कही सुन मेरी माता । पूछन कूं पठयो मम ताता ॥
काकी धीको पिता तुम्हारो । कैसे तुम्हरे जन्म हमारो ॥
इहां आवन को कारन को है । सतसत कहू ज्योंकरि जो है ॥