भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
पृष्ठ 635, कुल 690 में से
संदर्भ में पढ़ें५६२ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
चित्रगुप्त उवाच ॥ दोहा ॥
चित्रगुप्त कही दूतसों, पूरी भई जु आस।
अब याकूं ले जाइए, धरमराय के पास॥ २३ ॥
सुनकै तुरतही लेगए, नमस्कार करि जाय।
धर्मराय वा देखकै, बोले अधिकी भाय ॥ २४ ॥
आधा आसनही दिया, बैठाया कर चाव।
चरन धोय पूजाकरी, जान किया ऋषि भाव ॥२५॥
यम उवाच ॥ चौपाई ॥
धरमराय हँस बचन सुनाए। सभी देख कहो सुख सूं आये ॥
नासकेतजी ठौर निहारी। तुमने देखी नगरी सारी ॥
नासकेत उवाच ॥
तुम किरपा सों स्वर्ग निहारे। अरु हम देखे नरक अठारे ॥
पापी पुन्यो सब हां देखे। अरु उनके फल सभी बिसेखे ॥
अबइक अरज़ और सुन लीजे। घर जाने की आज्ञा दीजे ॥
माता दुखी पिता दुख भारूं। जाय मिलूं दुख सबही टारूं ॥
उनसूं बचन किया था आगूं। देख जमपुरी चरनों लागूं॥२६॥
दोहा ॥
नमस्कार कर यों कही, देखो सबही भेव।
अब मात पिता पै जायहूं, मोकूं आयसु देव॥ २७॥
यम उवाच ॥ चौपाई ॥
धर्मराय कही आछी बाता। बचन कहो यह मोहिं सुहाता ॥
अब हम तोकूं यह वर दीना। होगा अमर सदा परबीना ॥
अरु काया बूढ़ी नहि होगी। हमरे बरतैं रहै निरोगी ॥