भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंनासकेतलीलावर्णन । ५८७
मोकूं अरु अपनी माताकूं । हमें छोड़ के ह्वां मत जातू ॥
ऐसे वचन पिता जब बोले । नासही केत दीन हो बोले ॥
नांसकेत उवाच ॥
एहो पिता डिगा मत मोकूं । नमस्कार बहुते करूं तोकूं ॥
ध्यान तुम्हारो हिरदै धरि हूं । वचन तुम्हारे कूं सब करिहूं ॥
सत से सूरज तपता मानौं । सतसूं पिरथी कूं थिर जानौं ॥
सतसूं अगन जलत है सोई । सतसूं चन्दा अस्थित होई ॥
सतसूं लोक रहत ठहराई । सतसूं धर्म सदा बिरधाई ॥
सतसूं यह ब्रह्माण्ड खड़ा है । सत सूं सत्ती सूर अड़ा है ॥
हे महाराज साख कहूं एका । एक समय विधि कियो विवेका ॥
अश्वमेध यज्ञ सहस्रु लीने । इक पलड़े में राख जु दीने ॥
दूजे पलड़े में सत राखा । भारी भया सांच यह साखा ॥१७॥
दोहा ॥
यज्ञ पलड़ा ऊंचे गया, सत पलड़ा रहा भार ।
सत करिकै जो रहत नर, सोमसान सम धार ॥१८॥
ज्यों मसान तज दीजिए, वा नर कूं यों त्याग ।
सत्य जतन कर राखिये, सतही सेती लाग ॥१९॥
स्वर्ग सत्तसूं पाइये, सतही सों गति होय ।
सत्य धर्म सें हीन नर, जाहि नरककूँसोय ॥२०॥
तातें शोक निवारिये, बुधकों थिर कर लेहु ।
मैं जाऊं जमलोक कँ, येहि जु आज्ञा देहु ॥२१॥
ठौर ठौर कूं देखकर, आऊं चरनों पास ।
बेगहि आ दरशन करूं, मतहो नेक उदास ॥२२॥
वैशंपायन उवाच ॥
वैशंपायन कहत है, हे राजा सुज्ञान ।