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भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)

Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas

सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished690 पृष्ठ

५६८ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
दोहा ॥
बाजे बहुतक संग बजत, अरु गावत ही गीत ।
नंगार सैनिक सी चली, ज्यों थी नितकी रीत ॥१०॥
चौपाई ॥
जा पहुंची गंगा तट ठांहीं। क्रीड़ा करन लगी जलमाहीं ॥
ब्रह्मचारन शुभ लक्षण धारी। रूप प्रकाश रही है भारी ॥
गंगा जी में ठाढ़ी भई । उसी पद्म कूं देखत भई ॥
दिव्य सुगंध जु तैरत जावे । सूरज चंद किरन सरमावे ॥
नर क्या छूयसकै सो वाकों। कंवल जु तेजवंत है ताकों ॥
कन्या देख अचंभै रही। निज सखियन सों ऐसे कही ॥
इसी फूल के निकटै जावो । पकड़ हाथ सूं मोपै लावो ॥
अज्ञा सूं कन्या गहि ल्याई। चन्द्रवती लीनों हरषाई ॥११॥
दोहा ॥
कुशा माहिं सूं खोलकर, सूंघा नाक लगाय ।
उसमें जो बीरज हुता, पैठा नाभ मंझाय ॥ १२ ॥
चौपाई ॥
सखियों सहित नहाय कर आई। जानी ना हरिकी चतुराई ॥
पहल महीने फूलन आये । दूजे मांस अंग पलटाये ॥
मांस तीसरे मोटी काया। चौथे उदर बड़ा होय आया ॥
पंचवें रोम पलट जो गए । अस्थन कछू श्याम जो भए ॥
छठै सातवैं ऐसा भया । पेट जो बड़ा बहुत हो गया ॥
कन्या उदर देख भई बौरी । तेज भ्रिष्टभया गति मति औरी॥
सकल विकल मन व्याकुल नैना। शोक सिंधुमें परी अचैना ॥
धीरज तजकै रोवन लागी। चरनदास कहैं दुखमें पागी ॥

नासकेतलीलावर्णन । ५६६
दोहा ॥
निज कन्या पूछन लगी, हे शुभ क्यों रोवंत ।
सुख दीन्हे करतारने, दुख कहु क्यों होवंत ॥ १४ ॥
हमें बतावो बेगही, तन मनमें उकलन्त ।
तुम कूं रोवत देखके, हमकूं कष्ट अत्यन्त ॥ १५ ॥
सखियों के सुन बचन ही, रोवत उत्तर दीन ।
कहूं अचम्भे की सभी, अचरज ही कूं चीन ॥ १६ ॥
चौपाई ॥
मैं कुलमाहिं अकीरतवारी । भई सुनौरी सखी पियारी ॥
अरु दूषन रघुवंश मँझारी । अदिष्टगर्भमोहिभयो विकारी ॥
मैं नहीं जानूं क्या हो गया । भारी दुख हिये माहीं छया ॥
अरु देखो रघु महलों माहीं । देवत आय सकै कोइ नाहीं ॥
गंध्रव असुर न आवन पावै । मनुषों की तो कौन चलावै ॥
वड़ा अचंभा भारी भय है । तीन लोक में हुई न है है ॥
सुनिकै सखी सबै मुरझानी । पीरे बदन भई सब स्यानी ॥
मींढनलगी जू करसूं करही । इकदांतोंबिचअंगुलीधरही॥१७॥
दोहा ॥
व्याकुल होकै तुरत ही, गई रानी के पास ।
हाथ जोड़ ठाढ़ी भई, होकर बहुत उदास ॥ १८ ॥
और कही जी दान द्यो, तो हम कहैं सुनाय ।
अचरज कीसी बात हीं, कहतें जीव डराय ॥ १६ ॥
रानीउवाच ॥
चौपाई ॥
रघुरानी कही कन्या जानौ । अभैदान दियो निहचै मानौ ॥
जथा जोग कहु कन्या अबही । कछु मत राखो भाखो सबही ॥
जब कन्या ऐसे करि बोली । कहिनांह सकै कहा कहैं खोली ॥

५७० - श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
रोम खड़ेहों सब तन कांपै । अचरज बात कहा कहूं तापै ॥
चन्द्रवती के महलों माहीं। गंध्रबदेवत सकै न आई ॥
मानुष की तो साम्रथ क्या है। उन महलों में आया चाहै ॥
ऐसी ठोर अचंभा भया। तुम्हरी कन्या कों गर्भ रहा ॥
जब कन्याओं ऐसे कही। रानीसुनदुखिया बहु भई ॥२०॥
दोहा ॥
व्याकुल हो धरनी गिरी, रही न कछु संभार ।
शोकमाहिं पीड़ित भई, रघुराजा की नार ॥ २१ ॥
चौपाई ॥
उन कन्याओं ताहि उठाया। धीरज दे ताकूं बैठाया ॥
रानी कन्या रुक़सत कीनौ । आप गवन राजा मन दीनौ ॥
जा राजा पै बचन उचारे । सकल शास्त्रके जानन वारे ॥
स्वामी अभैदान जो पाऊं। तौ अचरज की बात सुनाऊं ॥
राजोवाच ॥
राजाकही अभै तुम पावो। यथा योग्य सब बात सुनावो ॥
भूप बचन सुन रानी बोली। डरप सकुचती मुखसों खोली ॥
रानीउवाच ॥
कन्या तुम्हरी दूषित जानौ । चन्द्रावती ऐसे पहिचानौ ॥
जाके गर्भ अदिष्ट भया है। मोपै कछून जात कहाहै॥२२॥
दोहा ॥
क्रोधवन्त राजा भया, सुन रानी के बैन ।
और कही उन क्या कियो, रक्त बरन भये नैन ॥ २३ ॥
चौपाई ॥
राजा सेवक लिए बुलाई। क्रोधवन्त हो बात सुनाई ॥
वा कन्या कों ले तुम जावो। जंगल माहिं छोड़ि कै आवो ॥

नासकेतलीलावर्णन । ५७१
सुनकर सेवक आयसु लीनों । बनोबास कन्याकूं दीनों ॥
भयानक जंगल अधिक उदासा । व्याघ्र सिंघान का जहां बासा ॥
दसों दिशा तक व्याकुल भारी । कहैकि विधिक्या विपता डारी ॥
यों अधीर हो रही कुंवारी । ज्यों हिरनी संग सूं भईन्यारी ॥
कहै रनजीत हिये के माहीं । ऐसी दुखी कहसकूं नाहीं ॥२४॥
इति श्रीनासकेतोपाख्याने चन्द्रवतीकन्यात्यागोनाम
द्वितीयोऽध्यायः ॥ २ ॥
वैशंपायनउवाच ॥
दोहा ॥
ऐसे कन्या दुखित थी, इतने ही के माहिं ।
फिरता आया एक ऋषि, करी दया की छांहिं ॥ १ ॥
चौपाई ॥
सच धर्म में था वह पूरा । तप के मांहीं अधिकी सूरा ॥
हुता जु श्रेष्ठ मुनियों के माहीं । लैन फूल फल आया व्हांहीं ॥
उलटा जब आश्रम कूं चाला । लिये फूल फल कुशा कृपाला ॥
रोवत कन्या दिष्ट निहारी । चक्रित भया कौन यह बारी ॥
जाग्यवलक चिंता करि देखा । मनमें किए विचार अनेका ॥
यह दमयन्ती कै घिरताची । कै रंभा है सुन्दर आछी ॥
कै तिलोत्तमा चित्तरलेखा । कै इन्द्राणी है जु मैनिका ॥
देव सुता कै राज कुमारी । ऐसैं सोचकियो ऋषिभारी ॥२॥
दोहा ॥
छबि गुण रूप अधिक तहां, ससिवदनी अधिकाय ।
अंग अंग सुन्दर सबै, शोभा कही न जाय ॥३॥
सुन्दर कन्या देख कर, अचरज -मन में लाय ।
जाग्यवलक पूछत - भये, ऐसे वचन सुनाय ॥४॥

५७२ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
चौपाई ॥
हे कन्या तू कित सूं आई। है तू कौन पिता को माई ॥
कौन काज जंगल के माहीं। आप अकेली संग कोई नाहीं ॥
सिंघ जरक भेढ़ा इहि ठाईं। सो तोकूं भक्षन करि जाईं ॥
फिर कन्या वह ऐसे बोली। अपनी बिपता कही सबखोली ॥
हे ब्राह्मण क्या पूछै मेरी। मैं कुल बैरन दुखी घनेरी ॥
राजा रघु की मैं हूं बेटी। पिछले पापन मोहिं लपेटी ॥
बिन जानैं भयो गरभ दुखारी। पिता मोहिं निरजल बनडारी ॥
शोकवान सों आतुर भारी। दुखमें पीडत हिये मझारी ॥५॥
दोहा ॥
यों कन्या के बचन सुन, दुखी भयो ऋषिराय ।
सब अंगन संतप्त हो, बोला फिर दुहराय ॥ ६ ॥
ऋषिरुवाच ॥
हे देवी तू धर्मकी, बेटी मैं करी आज ।
मेरै आश्रम के बिषे, चल के सदा विराज ॥ ७ ॥
परमेश्वर हित सेवहीं, तहां करूं चितलाय ।
कंद साग फल लायकै, आगे धरूं बनाय ॥ ८ ॥
जब प्रसन्न होय संग भई, आई आश्रम माहिं ।
चरणदास कहैं रहने लगी, कोई अँदेसो नाहिं ॥ ६ ॥
बहुत दिना रहते हुए, गरभ भयो दसमास ।
जब उकताई देहसों, दुख मानौं बहु तास ॥१०॥
जब जान्यों परसूत का, समां जु पहुंचा आय ।
भवन बिसारो सकुच सों, पहुंची बन में जाय ॥११॥
चौपाई ॥
गंगा जी पुनी हांई बिराजै । निर्मल जल शुध अधिकी राजै ॥

: नासकेतलीलावर्णन । ५७३
नमस्कार जाकर उन कीनों । सरन लई चित नीकें दीनों ॥
पार ब्रह्म कूं लिया संभारी । अरु कही तुमपर जाऊं वारी ॥
फिर सूरज कूं नीकै धाया । जग पांलन तुम दिनके राया ॥
अरुकही विष्णु जगत के स्वामी । घट घट के तुम अंतरजामी ॥
महादेव अरु गौरा माई । सभी देव मम करो सहाई ॥
जो मैं शुद्ध वंश में उपजी । हूं मैं शुद्ध शुद्धही शुभजी ॥
रघु मम पिता मात सतवंती । उनकी पुत्री मैं कुलवंती ॥१२॥
दोहा ॥
जो मेरी या देह में, पाप नहीं है मूर ।
तो जैसे गर्भ रहा है, उस मारग हो दूर ॥ १३ ॥
अहो विधाता जगतपति, यही अरज सुन लेह ।
मेरा वचन जु सांच है, तोसिताब सुख देह ॥ १४ ॥
वैशंपायनउवाच ॥
कन्या की करुना सुनी, जगजीवन करतार ।
तबै गर्भ वह उदर सों, आया कंठ मझार ॥ १५ ॥
कंठ सूं आया सीस में, छींक भई तिह बार ।
तबहीं निकसा बाहरे, नासाही के द्वार ॥ १६ ॥
चौपाई ॥
आई छींक सभी दुख टारे । बालक जनम्यों नासा द्वारे ॥
तातैं नासकेत भया नाऊं । द्योस घड़ी धन धन वह ठाऊं ॥
भूमि परतही बालक बोला । अपना भेद सभी तिन खोला ॥
हे माता सतवंती धरमी । मन में धीरज रख सुख करमी ॥
नासकेत मम नाम बखानौं । जोग सिद्ध मैं पूरन जानौं ॥
विधि के बचन जु पूरे भये । उद्दालक सूं आगे कहे ॥
ब्रह्मा का सुत है उद्दालक । ताही का जो मैं हूं बालक ॥

५७४ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ।
उपजा वाके बीरज सेती। कही सांच मानियो जेती॥
बालक बचन सुने जब माई। वह बहुती अचरज में आई॥१७॥
दोहा॥
जबै मोह बश होय कै, गोदी लिया उठाय।
फिर मुख में अस्तन दियो, खुशी भई अधिकाय ॥ १८॥
चौपाई॥
बालक शोभा कहा बखानूं। रूपवंत अरु धुर सूं ज्ञानूं॥
ऋषि के आश्रमही के माहीं। पालन लगी जिसी के ताईं ॥
लज्या दुख लियें रहै सुभागा। इकदिन बालक रोवनलागा॥
थांभा थमै न क्योंही कैसे। कीया क्रोध सुभांगी जैसे॥
हे पुत्तर रोवत क्यों भारी। तोही कारन बनमें डारी॥
वैशंपायनउवाच ॥
हूवा था जब एक बरस का। रूपवंत गुणवंत सरस का॥
क्रोध सहित माता मन आई। वहीं पिटारी एक बनाई॥
तामें बालक कूं पौढ़ाया। कुशाघासतापै लिपटाया॥१६॥
[दोहा॥
गही पिटारी आयकर, गंगा दिया बहाय।
तब कन्या उस पुत्रकूं, ऐसे कहा सुनाय॥२०॥
चौपाई॥
कौन गरभ का मैं नहीं जानूं। तेरे पिताकूं मैं न पिछानूं॥
जाके बीरज भया उपाधू। ताही के ढिग बहकर जातू॥
जब बालक वह बहता चला। आगे सुन होतबकी कला॥
बालक आया बहते बहते। जहां ऋषेश्वर बहुतक रहते॥
उद्दालक रहता था हांही। तेजवन्त तपसी अधिकाई॥
लखी पिटारी आवत सबही। पर लीनी उद्दालक तबेही॥

नासकेतलीलावर्णन । ५७५
लाकर राखी अपने ठांहीं । आप लगा शुभ कर्मों माहीं ॥
वेद करम सबही करि लीन्हें । पित्तरकारज भी सबकीन्हें॥२१॥
दोहा ॥
शुभकर्मों से छूटकर, खोला फेर पिटार ।
जो देखे तो पुरुष इक, सुन्दर अधिक अपार ॥२२॥
चौपाई ॥
गुणवन्ता अरु लक्षण धारी । ध्यान जोगमें था बलकारी ॥
उस बालक कों ऐसे लहिया । ज्ञानवान ऋषि जब यों कहिया ॥
हे बालक अब बसतू यहाँही । मेरे सुन्दर आश्रम माहीं ॥
ऐसे कहि राखा धर्मशाला । लागा बहुर करन प्रतिपाला ॥२३॥
इति श्रीनासकेतोपाख्याने पितापुत्रसंयोगोनाम
तृतीयोऽध्यायः ॥ ३ ॥
चौपाई ॥
एकदिना वाकी महतारी । गया क्रोध जब बात विचारी ॥
जिंह कारन बहुते दुखपाया । सो बालक मैं गंग बहाया ॥
सोच सोच मन में पछताई । गंगाकूल ढूंढ़ने धाई ॥
व्याकुल भई रोवती चाली । अपनी बुध कूं देती गाली ॥
चलती चलती पहुंची तहाँ । उद्दालक रहता था जहाँ ॥
तहाँ अपना बालकही पाया । भरिकै अंकौं गले लगाया ॥१॥
दोहा ॥
देख बहुत प्रसन्न हो, कही द्योस धन आज ।
ढूँढ़न कूं निकसी हुती, सो भए पूरन काज ॥ २ ॥
चौपाई ॥
यों कहि फिर बैठी वह बाला । बालकलियनलगो जज्ञसाला ॥
कन्या कही लीप कहा करिहो । को कारज या ऊपर सरिहो ॥

५७६ : श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
नासकेतउवाच ॥
जब बालक कही पिता हमारे । आज्ञा दे वन ओर सिधारे ॥
तातें लीपतहूं जज्ञसाला । आय करें जज्ञ वै मधकाला ॥
मातोवाच ॥
कन्या कही पुत्र तुम मेरे । ला मैं लींपूं बदले तेरे ॥
जब बालक लीपन नहिं कीन्हा । सकल सौंज माता कर दीन्हा ॥
चित्त दे लीपा सुन्दर बाला । और दिना सूं नीकी शाला ॥
चरणदास कहै फुल्लित भई । गंगा न्हान करन कूं गई ॥३॥
दोहा ॥
तब उद्दालक आइया, बनते अपनी ठाहिं ।
बालक सों धन धन कहा, खुशी भये मन माहिं ॥ ४ ॥
उद्दालकउवाच ॥
पुत्तर झाडू भलीदे, लीपन किया बनाय ।
अगन होत्रका मंडही, नई भांति दरसाय ॥ ४ ॥
बहुत खुशी तौपै भया, सुन्दर मन्दिर देख ।
ऐसा लीपाना कभी, जैसा आज बसेख ॥ ६ ॥
नासकेतउवाच ॥
पिता सुनौ लीपन करम, मैं नहिं कीया आज ।
मेरी माता आइया, जिन यह कीया काज ॥ ७ ॥
उद्दालकउवाच ॥
चौपाई ॥
हे पुत्तर तेरी जो माई । कारज करिके कितकूं धाई ॥
नासकेत सुनि ऐसे कही । गंगा ओर न्हान कूं गई ॥
सुन यह बचन खुशी ऋषि भयऊ । बहुरूं अगन होत्र चित्तदियऊ॥
करि करि करमजु बोलत भया । पुत्तर का कर कर मैं लिया ॥
फिर वासुं कही गंगा जावो । अपनी माता कूं ले आवो ॥

नासकेतलीलावर्णन । ५७७
आदर करके परसन करूं । पुष्पमूल ले आगे धरूं ॥
बचन पिता के सुनि वहां गया । हाथ जोरि मातासों कहा ॥
नासकेतउवाच ॥
हे माता चल आश्रम माहीं । जहां मम पिता बसोतुमहाहीं ॥
कंद साग नीकै करि पावो । ऐसे सुख सूं द्योस बितावो ॥
माताउवाच ॥
सुनि चन्द्रावती कहा बिचारा । क्यों सुतबचन अजोग उचारा ॥
सुनि करि रोम उठै तन सारे । बिना धर्म का वचन कहारे ॥
आगे भी किन्हीं यह जसलीया । माता दान पुत्र ने कीया ॥८॥
दोहा ॥
जग में ऐसी रीत है, पिता करै जो दान ।
कै कन्या का भ्रातही, कै मामूं परवान ॥६॥
नासकेत चुपका भया, मन माहीं सकुचाय ।
उठ आया ऋषिपासही, सबही दिया सुनाय ॥१०॥
चौपाई ॥
हे पुत्तर उन आछी भाखी । धर्मशास्त्र में योंही राखी ॥
कहो उदालक फिर ह्वां जइए । मेरे मुखसों ऐसे कहिए ॥
कौन वंश में जन्म तुम्हारा । कैसे उपजन भया हमारा ॥
कौन काजकों तुम यहां आई । यह सब बातें पूछो जाई ॥
बचन पिता के सुन वह धाया । माता कूं जा शीश नवाया ॥
नासकेतउवाच ॥
फेर कही सुन मेरी माता । पूछन कूं पठयो मम ताता ॥
काकी धीको पिता तुम्हारो । कैसे तुम्हरे जन्म हमारो ॥
इहां आवन को कारन को है । सतसत कहू ज्योंकरि जो है ॥

५७८ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ।
माताउवाच ॥
दोहा ॥
चंद्रवती यों बोलिया, सुन पुत्तर परवीन ।
जो तू पूछत है मुझे, मैं कहूं चित दे चीन्ह ॥ १२॥
परालबध के जोग तें, करम भया जो जान ।
सो मैं तोसों कहत हूं, साखी इक भगवान ॥ १३ ॥
सूरज ही के वंश में, रघु राजा परसिद्ध ।
मैं हूं बेटी तासु की, शुभ करनी सब सिद्ध ॥ १४ ॥
चौपाई ॥
चूने लीपे मंदर माहीं । रहती हुती सीक कछु नाहीं ॥
दसहजार कन्या ढिग रहतीं । भांति भांनि मम सेवा करनीं ॥
एक समै मैं गंगा गई। जहां जाय कै न्हाती भई ॥
लिपटा कुशा कमल इक आया । पकड़ा खोला नाक लगाया ॥
वामें बीरज मैं नहिं जाना । नाक छेद हो उदर समाना ॥
वासों मोकूं गरभ रहा था। सखियों लखि मम मात कहा था ॥
फिर रानी राजासों कह्यो । पिता बनोबास मोहि दियो ॥
रोवन लगी बहुत दुख पाया । वहां ही एक तपस्वी आया ॥१५॥
दोहा ॥
बेटी कर धीरज दिया, लें गया आश्रम माहिं ।
ह्वां सुखसों रहने लगी, सोच रहा कछु नाहिं ॥१६॥
चौपाई ॥
हे पुत्तर उपजा तू ह्वाहीँ । नासा के मध जन्म्यों आई ॥
तातें नासकेत धरयो नाऊँ । पलने लगे बहुर वह ठाऊँ ॥
बरस दिनाके हो सुख पागे । घुटनौं पैरौं चलने लागे ॥
इक दिन रुदन किया तुम भारा । मैं किरोध करि गंगा डारा ॥१७॥

नासकेतलीलावर्णन । ५७६
दोहा ॥
तभी रोस मोहि आइया, लीन्ही तुला बनाय ।
तामें तोहि सुलायकै, दीन्हों गंग बहाय ॥१८॥
चौपाई ॥
चार बरस पीछे सुध आई । बड़ी भई जब मैं पछताई ॥
जिह कारन बन लिया बसेरा । सुख छुटकै दुख हुवा घनेरा ॥
उपजा मोह क्रोध सब भागा । मन में तू बहु प्यारा लागा ॥
कलप कलप जिय रहा न जाई । तब उठ ढूंढनही कों धाई ॥
ढूंढत ढूंढत अब तोहिं पाया । आंखसुखी हुई हिया सिराया ॥
सुनरे पुत्तर यह मम बाता । जाय कहो तुम अपने ताता ॥
नासहीकेत उलट जब आया । पिताकूं सबही भेद सुनाया ॥१९॥
वैशंपायनउवाच ॥ दोहा ॥
सुनि उद्दालक हुलस मन, ब्रह्मा बचन संभार ।
चले संग ले बालका, जित चन्द्रावति नार ॥२०॥
चौपाई ॥
गये जहां बैठी बड़ भागी । मन सकुचा उठ चरनौँ लागी ॥
चरनों से दोउ नैन छुवाये । कहीं धन्य हम दरशन पाये ॥
देख ऋषीश्वर ने सुख पाया । हँस करि ऐसे बचन सुनाया ॥
चलिये रहिये सुत के पाहूं । मैं राजा रघु के ढिग जाऊं ॥
तीनौ मिल आश्रम में आये । करि भोजन सबही हुलसाये ॥
नासकेत चन्द्रावति बाला । दोनों राख चला धर्मसाला ॥
भोर भये अरु बहुत संवारा । उद्दालक ने गवन विचारा ॥
चरनदास कहै मन धरि आसा । जा पहुँचा राजारघुपासा ॥२१॥
दोहा ॥
राजा बहु आदर कियो, सिंहासन बैठाय ।

५८० श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
चरनों सिर धरि यों कहा, कृपा करी तुम आय ॥२२॥
उद्दालकउवाच ॥ चौपाई ॥
उद्दालक कहो बचन अनूपा । देखे पिरथी पर बहुभूपा ॥
तो सम राजा और न दूजो । तेरी वड़ी आरवल हूजो ॥
राजोवाच ॥
हाथ जोरकर पूछी बाता । किह कारन आये तुम नाथा ॥
मनमें हो सो अज्ञा दीजै । वही कामना हमसूं लीजै ॥
उद्दालकउवाच ॥
ऐ राजा मोहिं कछू न चहिये । सभी त्याग जंगल में रहिये ॥
मैं आयो यह इच्छा मेरी । कन्या मांगन आयों तेरी ॥
वंस वढ़ावनही के काजा । मोसे सुनों सांच यह राजा ॥
जाकूं दीजे मोहि परनाई । अपने मनकी खोल सुनाई ॥
राजोवाच ॥
राजा कही न बेटी मेरे । पूरे वचन करूं जो तेरे ॥
एक हुती सो खाई काला । मरी गई छूटो जंजाला ॥
उद्दालक उवाच ॥
उद्दालक कहो सुनौ हमारी । अबलग जीवत सुता तुम्हारी ॥
रघुरुवाच ॥
राजा चौंक कही मुसकाई । वह कन्या कित है ऋषिराई ॥
मोहिं दीखत अचरजसी बाता । यहतुमबोलकह्योकुसलाता २३
उद्दालकउवाच ॥ दोहा ॥
ऋषिने कह्यो चन्द्रावती, मेरे आश्रम माहिं ।
सुत समेत वहां छोड़कर, मैं आयो इहिं ठाहिं ॥२४॥
चौपाई ॥
अज्ञा वचन जु पूरे भये । जो हमकूं उन आगे कहे ॥

: नासकेतलीलावर्णन । ५८१
कहा कि पहिले बेटा पैहै । जिंह पाछै नारी हू अह है ॥
ऋषिने पिछली कही समझाई । आदि अन्तलों सबै सुनाई ॥
वंश हेत ब्रह्मा पै धायो । विधिने ऐसे बचन सुनायो ॥
पहिले पुत्तर पाछे तिरिया । तेरे भागन में यों धरिया ॥
यों कहि अन्तरध्यान विचारा । मैं निज अस्थलआन संभारा ॥
फिर रहकर तपही आराधा । मनमें रहै वासना व्याधा ॥
ताते बीज टरा कर लीना । ताकूं पदम माहिं धरदीना ॥
कुशालपेटी गंग बहाया । तो कन्या न्हाती हां आया ॥
वाकूं सूंघा कर में लया । बीज चढ़ा गर्भ होही गया ॥
नासा द्वार जनम जिन लीया । नासहीकेत नांव धरदीया ॥
कर कर कन्या क्रोध बहाया । ऐसे पुत्तर पहिले आया ॥
फिर वह वाकूं ढूंढ़न धाई । ऐसे मो अस्थल में आई ॥
ब्रह्मा बचन न टारे टरै । कोटि उपाव जु प्रानी करै ॥
ऋषि मुनि देवत दैयत सारे । समरथ कौन जु वाकूं टारे ॥
उद्दालक सब खोल सुनाई । रनजीतकहें राजामनआई २५
वैशंपायनउवाच ॥ दोहा ॥
तिस उप्रान्त जु भूप कूं, अचरज भयो हुलास ।
फिर उठकै महलों गया, रानी ही के पास ॥२६॥
चौपाई ॥
खुशी खुशी रानी सूं बोला । ऋषिका कहा सभी जो खोला ॥
रानी सांच मानियो सोऊ । ब्रह्मा बचन जु पूरे होऊ ॥
सुन रानी हियरे हुलसाई । अरु आपस में बात सुनाई ॥
राजा निकस द्वार फिर आया । उद्दालक कूं निकट बुलाया ॥
भक्ति सहित हँसकर यों बोला । बचन प्रीत के कहे अमोला ॥
सुन्दर रथ अरु सेवक मेरे । लेजा अपने संग सवेरे ॥

५८२ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
चन्द्रवती अरु बालक ल्यावो । ऐसे कही सिताबी आवो ॥
ऋषि सुन बचन खुशी जो भया । रथ सेवक ले अस्थल गया २७
दोहा ॥
रैन रहे अस्थान पर, गवन बिचारा भोर ।
दोनों रथ बैठाय कर, चाला वाही ओर ॥२८॥
चौपाई ॥
चला चला राजा पै आया । राजा देख बहुत सुख पाया ॥
राजा रघु अरु उसी की रानी । दोनोंने मिल सुता पिछानी २९
दोहा ॥
रोकर जब माता मिली, लीन्हीं कंठ लगाय ।
अरु नारी परवार की, सभी मिली जो आय ॥३०॥
चौपाई ॥
जब पण्डित कूं लिया बुलाई । साहा काढ लगन धरवाई ॥
किया विवाह दान बहु दीना । कपड़े गहने सेज नवीना ॥
दासी दासे दीने साथी । रथ घोड़े करहे अरु हाथी ॥
सोने मंढ़े सींग दई गइया । दूध भरी जो भैंसें दइया ॥
अरु बहु भांती दीने दाना । दीनी भौम बहुत सुखमाना ॥
बिदा करत जोरे दोउ हाथा । बिनती करी जु पिरथीनाथा ॥
नमस्कार कर ठाढ़ो भयो । जब ऋषि हंसकर ऐसे कह्यो ॥
कही उद्दालक सुनहो राजा । हस्ती घोड़े हम कहा काजा ॥
गहने कपड़े हम कहा करिहैं । इतना दान कहां ले धरि हैं ॥
सकल दहेज दिया ऋषि फेरी । एक न राखा चेरा चेरी ॥
चरनदास कहैं कछू न लीया । उलटा सभी फेर जो दीया ३१
दोहा ॥
नासकेत चन्द्रावती, बैठा कर रथ माहिं ।

नासकेतलीलावर्णन । ५८३
दोनों ही कूं ले गया, अपने आश्रम ठाहिं ॥ ३२ ॥
चौपाई ॥
तब हां सुख सों रहने लागे । सरसनेह में तीनों पागे ॥
रनजीत कहैं यह कथा पुरानी । जाकीमहिमा ऋषिन बखानी ॥
मनुष देवता पंडित गावै । धरमनीक सुनकर हुलसावै ॥
जित जित और पुरानन गाई । पाप मिटावन अरु सुखदाई ॥
ानरी धरमकी नवका जानौं । सुन्दर अधिक पवित्र मानौं ॥
भक्ति भावकर सुनैं जु कोई । भव जल पार उतर है सोई ३३
इति श्रीनासकेतोपाख्याने चन्द्रावतीविवाहो नाम
चतुर्थोऽध्याय ॥ ४ ॥
वैशंपायनउवाच ॥
दोहा ॥
वैशंपायन ने कहा, सुन जनमेजय भूप ।
तप करते ऋषि ने दिया, सुत कूं श्राप अनूप ॥ १ ॥
कहा कि जा जमलोक कूं, भारी कीया पाप ।
नासकेत लिया मानकै, उद्दालक का श्राप ॥ २ ॥
जनमेजयउवाच ॥
फिर जनमेजय पूछिया, हे बिप्पर सुन लेह ।
सुत कूं दीया श्राप क्यों, मोमन यह संदेह ॥ ३ ॥
सुतकूं दैना श्राप जो, दुर्ल्लभ सी यह बात ।
ऊपर अपनी आतमा, कैसे सोहै घात ॥ ४ ॥
चौपाई ॥
कौन प्रयोजन दिया सरापी । कैसे गया जमपुरी आपी ॥
कैसे देख देख सब आया । मोसौं सबही कहो सुनाया ॥
किसा नरक है जित दुख दावैं । किसा स्वर्ग है जहां सुख पावैं ॥
३९

५८४ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
वैशंपायनउवाच ॥
बोले बैशम सुनहो राजा । दिया सराप जौनही काजा ॥
जाकर हां सूं आया जैसे । चित दे सुनौ कहूं अब तैसे ॥
एक दिना उदालक राया । नासकेत कूँ वचन सुनाया ॥
मैं रहूं घर तुम बनकूं जावो । कन्द फूल फल लकड़ी लावो ॥
अगनहोत्र जासूँ हम करि हैं। शुभ करमों के कारज सरिहैं ॥
पिता की आज्ञा लेकर धाये । चले चले बन माहीं आए ॥
जिन हां एक सरोवर देखा । कंवल भरे ता माहिं बसेखा ॥
आसपास द्रुम हैं बहु भांती । फूले फले सुगन्ध सुहाती ॥
नाना पंछी बोलें बानी । सुन्दर ठोर देख मन मानी ॥
जित हां विधसूँ करि अस्नाना । देवत पित्तर पूजन ठाना ॥
दोहा ॥
नईवेद फल फूलसों, जिनक परसन कीन ।
रनजीता यों कहत है, अंजली सों जलदीन ॥ ६ ॥
फिर यों मन में आइया, बैठ धरूं हरि ध्यान ।
आराधन प्रभु को करूं, ऐसो उपजो ज्ञान ॥ ७ ॥
चौपाई ॥
तहां बैठ कर आसन कीनो । हरिके ध्यान माहिं मन दीनो ॥
जोग ध्यान की जुगत विचारी । सुरत लीन भई लागी ताडी ॥
दो अरु तीसदिना यो रही । बहुरु आप सहज खुलगई ॥
जबही घरकी चिंता आई । पिता की आज्ञा चितमें छाई ॥
तातें बेग चला हां आया । देख पिता कूं सीस नवाया ॥
देख पिता पुत्तर की ओरी । बचन क्रोध कहा वा ठोरी ॥
अगनहोत्र में विघ्न भया था । यातें बचन कठोर कहा था ॥

नासकेतलीलावर्णन । ५८५
रे पापी तू कित सूं आया । मेरा आयसु सभी भुलाया ॥
मैं भेजा फल फूल ही काजे । अग्निहोत्र के करने साजे ॥
अग्निहोत्रका तैं किया नासां । वा दिन मोमन रहा उदासा ॥८॥
दोहा ॥
अग्निहोत्र है देवता, परसन ब्रह्मा आदि ।
पितर मुनि तिरपत भवें, सुखदाई धर्मादि ॥६॥
बचन पिताके सुनलिए, बोले नासही केत ।
समझावत हो जो अबै, पुत्तरही के हेत ॥१०॥
नासकेत उवाच ॥ चौपाई ॥
सुनो पिता यह जानो दाई । अग्निहोत्र बंधन जगमाहीं ॥
जनम मरन के भय का दाता । सुख का नास करन ए बाता ॥
जोग समान और कछु नाहीं । जग समुद्र जासूं तिरजाई ॥
ब्रह्मा इंदर आदिक देवा । जोगही करिकै यह सिध लेवा ॥
सिद्ध होन का ऐसा कोई । और उपाव न दूजा होई ॥
उद्दालक उवाच ॥
हे पुत्तर ऋषि बड़े निहारे । अधिक तपस्या करनेवारे ॥
तिनहूं अग्निहोत्र कूँ धारा । जान पवित्र हिये मँझारा ॥
ऐसे वेदमाहिं लिख राखा । रनजीत कहैं उद्दालक भाखा ॥११॥
दोहा ॥
अग्निहोत्रही के बिना, ब्रह्म जज्ञ नहिं होय ।
अति पुनीत यह करमहै, करो चाव सो सोय ।
नासकेत उवाच ॥ चौपाई ॥
नासकेत कहै बचन हमारे । सुनो पिताजी कहूं विचारे ॥
अग्निहोत्र कर सुरग सिधारै । फेर जन्म पिरथी पर धारै ॥

५८६ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
• करमोंही से आवै जावै । विना जोग नहिं थिरता पावै ॥
पाप पुण्य दोऊ बेड़ी पग मैं । इन कूं तोड़ चलै हरि मग मैं ॥
भक्ति जोग अरु निर्मल ज्ञानो ।इनसूं मुक्ति होय सतजानो ॥
तीनों में सरधा सोई करै । निहचै भवसागर सूं तरै ॥
वास लहै चौथे पद माहीं । जनम मरन फिर होवे नाहीं ॥
कर्म करै अरु फल कूं चाहै । मुक्ति न पावै दुख सुख दाहै॥१३॥
वैशंपायन उवाच ॥ दोहा ॥
वैशंपायन कहत है, सुन जनमेजय भूप ।
उद्दालक सुन बचन सूं, भया तमोगुन रूप ॥ १४ ॥
चौपाई ॥
अरु मुखसों कहि पापी दोखी । तैने खोटी कही अनोखी ॥
है जु पिता का दूषक भारी । वेग जाउ जमलोक मँझारी ॥
ब्रह्म दण्ड तू मारा गया । तू जमलोक जोगहीं भया ॥
फिर सुनकर वह नासहिकेता । बड़े श्राप भू गिरा अचेता ॥
फिर चेतन होय ऐसें भाखा । पिता श्राप सीस पर राखा ॥
जाऊंगा जमलोक अवारूं । तुम्हरी आज्ञा कबहु न टारूं ॥
गिरापुत्तरकूं मुनि जबदेखा । ऋषिब्याकुल भया अधिकबिशेखा ॥
शोक घने सूं तपत भया है । बहु विलाप दुख घना ल्याहै॥१५॥
दोहा ॥
हाय पुत्र मम आतमा, मैं तोहिं दीनों श्राप ।
मैं क्रोधी अज्ञान हूं, लिया ढांप मोहिं पाप ॥१६॥
चौपाई ॥
हे पुत्तर धर्मराय जहां है । मारग दारुण दुःख तहां है ॥
और नरक हां है भयमाना । वैसी ठौर न तोकूं जाना ॥
छोटा बालक डर हां भारी । दुख भुगतत हैं नर अरु नारी ॥

नासकेतलीलावर्णन । ५८७
मोकूं अरु अपनी माताकूं । हमें छोड़ के ह्वां मत जातू ॥
ऐसे वचन पिता जब बोले । नासही केत दीन हो बोले ॥
नांसकेत उवाच ॥
एहो पिता डिगा मत मोकूं । नमस्कार बहुते करूं तोकूं ॥
ध्यान तुम्हारो हिरदै धरि हूं । वचन तुम्हारे कूं सब करिहूं ॥
सत से सूरज तपता मानौं । सतसूं पिरथी कूं थिर जानौं ॥
सतसूं अगन जलत है सोई । सतसूं चन्दा अस्थित होई ॥
सतसूं लोक रहत ठहराई । सतसूं धर्म सदा बिरधाई ॥
सतसूं यह ब्रह्माण्ड खड़ा है । सत सूं सत्ती सूर अड़ा है ॥
हे महाराज साख कहूं एका । एक समय विधि कियो विवेका ॥
अश्वमेध यज्ञ सहस्रु लीने । इक पलड़े में राख जु दीने ॥
दूजे पलड़े में सत राखा । भारी भया सांच यह साखा ॥१७॥
दोहा ॥
यज्ञ पलड़ा ऊंचे गया, सत पलड़ा रहा भार ।
सत करिकै जो रहत नर, सोमसान सम धार ॥१८॥
ज्यों मसान तज दीजिए, वा नर कूं यों त्याग ।
सत्य जतन कर राखिये, सतही सेती लाग ॥१९॥
स्वर्ग सत्तसूं पाइये, सतही सों गति होय ।
सत्य धर्म सें हीन नर, जाहि नरककूँसोय ॥२०॥
तातें शोक निवारिये, बुधकों थिर कर लेहु ।
मैं जाऊं जमलोक कँ, येहि जु आज्ञा देहु ॥२१॥
ठौर ठौर कूं देखकर, आऊं चरनों पास ।
बेगहि आ दरशन करूं, मतहो नेक उदास ॥२२॥
वैशंपायन उवाच ॥
वैशंपायन कहत है, हे राजा सुज्ञान ।