भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंनासकेतलीलावर्णन । ५६६
दोहा ॥
निज कन्या पूछन लगी, हे शुभ क्यों रोवंत ।
सुख दीन्हे करतारने, दुख कहु क्यों होवंत ॥ १४ ॥
हमें बतावो बेगही, तन मनमें उकलन्त ।
तुम कूं रोवत देखके, हमकूं कष्ट अत्यन्त ॥ १५ ॥
सखियों के सुन बचन ही, रोवत उत्तर दीन ।
कहूं अचम्भे की सभी, अचरज ही कूं चीन ॥ १६ ॥
चौपाई ॥
मैं कुलमाहिं अकीरतवारी । भई सुनौरी सखी पियारी ॥
अरु दूषन रघुवंश मँझारी । अदिष्टगर्भमोहिभयो विकारी ॥
मैं नहीं जानूं क्या हो गया । भारी दुख हिये माहीं छया ॥
अरु देखो रघु महलों माहीं । देवत आय सकै कोइ नाहीं ॥
गंध्रव असुर न आवन पावै । मनुषों की तो कौन चलावै ॥
वड़ा अचंभा भारी भय है । तीन लोक में हुई न है है ॥
सुनिकै सखी सबै मुरझानी । पीरे बदन भई सब स्यानी ॥
मींढनलगी जू करसूं करही । इकदांतोंबिचअंगुलीधरही॥१७॥
दोहा ॥
व्याकुल होकै तुरत ही, गई रानी के पास ।
हाथ जोड़ ठाढ़ी भई, होकर बहुत उदास ॥ १८ ॥
और कही जी दान द्यो, तो हम कहैं सुनाय ।
अचरज कीसी बात हीं, कहतें जीव डराय ॥ १६ ॥
रानीउवाच ॥
चौपाई ॥
रघुरानी कही कन्या जानौ । अभैदान दियो निहचै मानौ ॥
जथा जोग कहु कन्या अबही । कछु मत राखो भाखो सबही ॥
जब कन्या ऐसे करि बोली । कहिनांह सकै कहा कहैं खोली ॥