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सर्वकोश
भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)

भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)

Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas

सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished690 पृष्ठ

पृष्ठ 616, कुल 690 में से

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पृष्ठ 616

: नासकेतलीलावर्णन । ५७३
नमस्कार जाकर उन कीनों । सरन लई चित नीकें दीनों ॥
पार ब्रह्म कूं लिया संभारी । अरु कही तुमपर जाऊं वारी ॥
फिर सूरज कूं नीकै धाया । जग पांलन तुम दिनके राया ॥
अरुकही विष्णु जगत के स्वामी । घट घट के तुम अंतरजामी ॥
महादेव अरु गौरा माई । सभी देव मम करो सहाई ॥
जो मैं शुद्ध वंश में उपजी । हूं मैं शुद्ध शुद्धही शुभजी ॥
रघु मम पिता मात सतवंती । उनकी पुत्री मैं कुलवंती ॥१२॥
दोहा ॥
जो मेरी या देह में, पाप नहीं है मूर ।
तो जैसे गर्भ रहा है, उस मारग हो दूर ॥ १३ ॥
अहो विधाता जगतपति, यही अरज सुन लेह ।
मेरा वचन जु सांच है, तोसिताब सुख देह ॥ १४ ॥
वैशंपायनउवाच ॥
कन्या की करुना सुनी, जगजीवन करतार ।
तबै गर्भ वह उदर सों, आया कंठ मझार ॥ १५ ॥
कंठ सूं आया सीस में, छींक भई तिह बार ।
तबहीं निकसा बाहरे, नासाही के द्वार ॥ १६ ॥
चौपाई ॥
आई छींक सभी दुख टारे । बालक जनम्यों नासा द्वारे ॥
तातैं नासकेत भया नाऊं । द्योस घड़ी धन धन वह ठाऊं ॥
भूमि परतही बालक बोला । अपना भेद सभी तिन खोला ॥
हे माता सतवंती धरमी । मन में धीरज रख सुख करमी ॥
नासकेत मम नाम बखानौं । जोग सिद्ध मैं पूरन जानौं ॥
विधि के बचन जु पूरे भये । उद्दालक सूं आगे कहे ॥
ब्रह्मा का सुत है उद्दालक । ताही का जो मैं हूं बालक ॥