भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें५६८ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
दोहा ॥
बाजे बहुतक संग बजत, अरु गावत ही गीत ।
नंगार सैनिक सी चली, ज्यों थी नितकी रीत ॥१०॥
चौपाई ॥
जा पहुंची गंगा तट ठांहीं। क्रीड़ा करन लगी जलमाहीं ॥
ब्रह्मचारन शुभ लक्षण धारी। रूप प्रकाश रही है भारी ॥
गंगा जी में ठाढ़ी भई । उसी पद्म कूं देखत भई ॥
दिव्य सुगंध जु तैरत जावे । सूरज चंद किरन सरमावे ॥
नर क्या छूयसकै सो वाकों। कंवल जु तेजवंत है ताकों ॥
कन्या देख अचंभै रही। निज सखियन सों ऐसे कही ॥
इसी फूल के निकटै जावो । पकड़ हाथ सूं मोपै लावो ॥
अज्ञा सूं कन्या गहि ल्याई। चन्द्रवती लीनों हरषाई ॥११॥
दोहा ॥
कुशा माहिं सूं खोलकर, सूंघा नाक लगाय ।
उसमें जो बीरज हुता, पैठा नाभ मंझाय ॥ १२ ॥
चौपाई ॥
सखियों सहित नहाय कर आई। जानी ना हरिकी चतुराई ॥
पहल महीने फूलन आये । दूजे मांस अंग पलटाये ॥
मांस तीसरे मोटी काया। चौथे उदर बड़ा होय आया ॥
पंचवें रोम पलट जो गए । अस्थन कछू श्याम जो भए ॥
छठै सातवैं ऐसा भया । पेट जो बड़ा बहुत हो गया ॥
कन्या उदर देख भई बौरी । तेज भ्रिष्टभया गति मति औरी॥
सकल विकल मन व्याकुल नैना। शोक सिंधुमें परी अचैना ॥
धीरज तजकै रोवन लागी। चरनदास कहैं दुखमें पागी ॥