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सर्वकोश
भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)

भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)

Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas

सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished690 पृष्ठ

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पृष्ठ 614

नासकेतलीलावर्णन । ५७१
सुनकर सेवक आयसु लीनों । बनोबास कन्याकूं दीनों ॥
भयानक जंगल अधिक उदासा । व्याघ्र सिंघान का जहां बासा ॥
दसों दिशा तक व्याकुल भारी । कहैकि विधिक्या विपता डारी ॥
यों अधीर हो रही कुंवारी । ज्यों हिरनी संग सूं भईन्यारी ॥
कहै रनजीत हिये के माहीं । ऐसी दुखी कहसकूं नाहीं ॥२४॥
इति श्रीनासकेतोपाख्याने चन्द्रवतीकन्यात्यागोनाम
द्वितीयोऽध्यायः ॥ २ ॥
वैशंपायनउवाच ॥
दोहा ॥
ऐसे कन्या दुखित थी, इतने ही के माहिं ।
फिरता आया एक ऋषि, करी दया की छांहिं ॥ १ ॥
चौपाई ॥
सच धर्म में था वह पूरा । तप के मांहीं अधिकी सूरा ॥
हुता जु श्रेष्ठ मुनियों के माहीं । लैन फूल फल आया व्हांहीं ॥
उलटा जब आश्रम कूं चाला । लिये फूल फल कुशा कृपाला ॥
रोवत कन्या दिष्ट निहारी । चक्रित भया कौन यह बारी ॥
जाग्यवलक चिंता करि देखा । मनमें किए विचार अनेका ॥
यह दमयन्ती कै घिरताची । कै रंभा है सुन्दर आछी ॥
कै तिलोत्तमा चित्तरलेखा । कै इन्द्राणी है जु मैनिका ॥
देव सुता कै राज कुमारी । ऐसैं सोचकियो ऋषिभारी ॥२॥
दोहा ॥
छबि गुण रूप अधिक तहां, ससिवदनी अधिकाय ।
अंग अंग सुन्दर सबै, शोभा कही न जाय ॥३॥
सुन्दर कन्या देख कर, अचरज -मन में लाय ।
जाग्यवलक पूछत - भये, ऐसे वचन सुनाय ॥४॥