भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
पृष्ठ 613, कुल 690 में से
संदर्भ में पढ़ें५७० - श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
रोम खड़ेहों सब तन कांपै । अचरज बात कहा कहूं तापै ॥
चन्द्रवती के महलों माहीं। गंध्रबदेवत सकै न आई ॥
मानुष की तो साम्रथ क्या है। उन महलों में आया चाहै ॥
ऐसी ठोर अचंभा भया। तुम्हरी कन्या कों गर्भ रहा ॥
जब कन्याओं ऐसे कही। रानीसुनदुखिया बहु भई ॥२०॥
दोहा ॥
व्याकुल हो धरनी गिरी, रही न कछु संभार ।
शोकमाहिं पीड़ित भई, रघुराजा की नार ॥ २१ ॥
चौपाई ॥
उन कन्याओं ताहि उठाया। धीरज दे ताकूं बैठाया ॥
रानी कन्या रुक़सत कीनौ । आप गवन राजा मन दीनौ ॥
जा राजा पै बचन उचारे । सकल शास्त्रके जानन वारे ॥
स्वामी अभैदान जो पाऊं। तौ अचरज की बात सुनाऊं ॥
राजोवाच ॥
राजाकही अभै तुम पावो। यथा योग्य सब बात सुनावो ॥
भूप बचन सुन रानी बोली। डरप सकुचती मुखसों खोली ॥
रानीउवाच ॥
कन्या तुम्हरी दूषित जानौ । चन्द्रावती ऐसे पहिचानौ ॥
जाके गर्भ अदिष्ट भया है। मोपै कछून जात कहाहै॥२२॥
दोहा ॥
क्रोधवन्त राजा भया, सुन रानी के बैन ।
और कही उन क्या कियो, रक्त बरन भये नैन ॥ २३ ॥
चौपाई ॥
राजा सेवक लिए बुलाई। क्रोधवन्त हो बात सुनाई ॥
वा कन्या कों ले तुम जावो। जंगल माहिं छोड़ि कै आवो ॥