सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)

भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)

Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas

सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished690 पृष्ठ

पृष्ठ 615, कुल 690 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 615

५७२ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
चौपाई ॥
हे कन्या तू कित सूं आई। है तू कौन पिता को माई ॥
कौन काज जंगल के माहीं। आप अकेली संग कोई नाहीं ॥
सिंघ जरक भेढ़ा इहि ठाईं। सो तोकूं भक्षन करि जाईं ॥
फिर कन्या वह ऐसे बोली। अपनी बिपता कही सबखोली ॥
हे ब्राह्मण क्या पूछै मेरी। मैं कुल बैरन दुखी घनेरी ॥
राजा रघु की मैं हूं बेटी। पिछले पापन मोहिं लपेटी ॥
बिन जानैं भयो गरभ दुखारी। पिता मोहिं निरजल बनडारी ॥
शोकवान सों आतुर भारी। दुखमें पीडत हिये मझारी ॥५॥
दोहा ॥
यों कन्या के बचन सुन, दुखी भयो ऋषिराय ।
सब अंगन संतप्त हो, बोला फिर दुहराय ॥ ६ ॥
ऋषिरुवाच ॥
हे देवी तू धर्मकी, बेटी मैं करी आज ।
मेरै आश्रम के बिषे, चल के सदा विराज ॥ ७ ॥
परमेश्वर हित सेवहीं, तहां करूं चितलाय ।
कंद साग फल लायकै, आगे धरूं बनाय ॥ ८ ॥
जब प्रसन्न होय संग भई, आई आश्रम माहिं ।
चरणदास कहैं रहने लगी, कोई अँदेसो नाहिं ॥ ६ ॥
बहुत दिना रहते हुए, गरभ भयो दसमास ।
जब उकताई देहसों, दुख मानौं बहु तास ॥१०॥
जब जान्यों परसूत का, समां जु पहुंचा आय ।
भवन बिसारो सकुच सों, पहुंची बन में जाय ॥११॥
चौपाई ॥
गंगा जी पुनी हांई बिराजै । निर्मल जल शुध अधिकी राजै ॥