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भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)

Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas

सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished690 पृष्ठ

' or 'व्र'?
Look at the loop: it is identical to the 'ब्र' in 'पतिब्रत' below it!
Wait! Does it have a slash inside?
YES! Look at the loop: there is a diagonal slash inside it!
And does it have a र-फला?
Wait, look at the bottom of the stem: there is a diagonal stroke pointing down-left, JUST LIKE 'ब्र'!
Wait, and what is next to it?
An 'ा' (aa-matra)!
Wait, so is it 'ब्रा'?
Wait, if it's 'ब्रा', what is before it? 'पति'!
"पतिब्रा"?
Wait! "पतिव्रता" -> "पतिब्रा"?!
In Braj poetry:
पतिब्रता is often shortened or poeticized as "पतिब्रता" or "पतिब्रा"?
Wait, rhyming with "जानियां" / "आनियां"?
Wait, no!
Is the next word "आनियां"?
Wait! Look at the word after it:
"आनियां" has:
आ (aa)
न + ि = नि
य + ा + ं = यां!
Wait, if the line ends in "आनियां", what is the word before it?
"जुपतिब्रा"? "जु पतिब्रा"?
Wait, what does "पतिब्रा आनियां" mean?
"पतिब्रता आनियां"?
Wait, what if the letter is NOT 'ब्रा'?
What if it is:
'जुवती'

  • कुरुक्षेत्रलीलावर्णन । ५२६
    अपने पतिसों प्रीति सदा बिस्तारई ॥२५॥
    तब राधा यह बात सभी मन में लही ।
    अपनी प्रीत अधिकार सकुच नहीं कही ॥
    यह सुनके-जदुनाथ जु ऐसे बोलिया ।
    सबके नीकी भांत जु हिय दृग खोलिया ॥
    एकै टौना जान सकल जग माहि है ।
    इह सम टौना और दूसरो नांहिं है ॥
    ब्रज भूमि सें एक यहै टौना आइया ।
    सो मैं मूरतवंत तुम्हें दिखराइया ॥
    मनबच करकै मोहिं जु चाहै बस करै ।
    श्रीवृषभानुकुमारि की सेवा चित धरै ॥
    रुकमिन के मनमाहिं जु सुनके आइया ।
    यह टौना बड़भाग सों हमने पाइया ॥
    रुकमिन तन मन-आप कुवर राधै दियो ।
    राधाको मन मुदित प्रीत सों कर लियो ॥
    तबहीं भूषण सरस जु रुकमिन के हुते ।
    पहिरे राधा कुँवर जु मनमाने तबै ॥ २६ ॥
    रुकमिन अपने हाथ भूषण पहिराया ।
    इह बिध टौना डार कै प्रीत बधाइया ॥
    और सखी जे साथ सिंगार सिंगारिया ।
    सतभामा मन माहिं जु कुढ़ कुढ़ हारिया ॥
    अष्टि सुगन्धि मँगाय आपने हाथ सों ।
    ले रुकमिन सब लाये राधिका गात सों ॥
    अतिही शुद्ध संवार जबै भोजन भये ।
    नंद यसोधा पास तबै मोहन गये ॥

५३० श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
रुकमिन नाना भांति करे बिञ्जन सबै ।
अनगिन स्वाद न जाहिं गिनाए तासमैं ॥
भोजन को जब बैठे हेम के थारही ।
एक और जदुकुलिन एक ब्रज नारही ॥
कपट बचन बहुभांति जु सतभामा कहै ।
मुख मीठी मनचोख अधिक हिये में लहै ॥
कही करो जिन और परोसो लायके ।
दूध दही बहु भाँति मही जु मँगायके ॥ २७ ॥
खोटी जियमें जानि कुढ़ी रानी सबै ।
श्रीराधा सुन बैन जु मुसुकानी तबै ॥
भोजन सुखद कराय कुँवर सुखरास को ।
पौढ़ाई ले सेज सु अधिक विलास सों ॥
अपने अपने गेह सबै रानी गईं ।
रुकमिन राधा साथ करत बातें रहीं ॥
निस भई एसी भांत हिलत और मिलतही ।
सिज्या जोगा जोग बिछाई ललितही ॥
तब हरि अपने आई मन्दर पग धारिया ।
सबको सुख अधिकाइके दुख निरवारिया ॥
रुकमिन राधा कुँवर कूं सेज सुवाइ ही ।
आई हरी के पास पलोटन पाइ ही ॥
पाय पलोटत नींद श्याम को ना परी ।
सुन्दर राधा सेज पै तरफत है परी ॥
रुर्कमिन से कहो श्याम काज इक कीजिये ।
राधा आवत नाहिं नीन्द सुन लीजिये ॥ २८ ॥
हौं तो वाको भेव जीय को ज़ानहूं ।

कुरुक्षेत्रलीलावर्णन । ५३१
बारेपन की टेव सभी पहिचान हूं ॥
जब सोवन की बेर वाह की आवई ।
बहु मेवन के ढेर सुमाय करावई ॥
पै राधा कों नींद नहीं कबहूं परै ।
जब लगही वह पान दूधको ना करै ॥
तातें वाको नींद न कबहूं आवई ।
मो बिन यह सुध और सु को हिय लावई ॥
पाय पलोटत माहिं तबै उठ धाइया ।
रुकमिन राधा सेज पै तरफत पाइया ॥
डार कटोरे माहिं जु दूध पिवाइया ।
हलबल में भली भांत न दूध सिराइया ॥
तातो दूध पिवाय कै आई रुकमिनी ।
दाबन लागी पाय श्याम के दुलहनी ॥
दावन चरन सरोज जभी कर में गह्यो ।
सीतकार कर पाय खैंच हरि जू लियो ॥२६॥
रुकमिन कह्यो तिहकाल कहा हमने कियो ।
सीजुखरी किहकाज खैंच क्यों पग लियो ॥
तातो हो वह दूध पिये तें पग जरे ।
हमरे पायन माहिं अबे छाले परे ॥
राधे पीवे दूध तुम्हारो पग जरो ।
हमसों ऐसी बात अटपटी जिन करो ॥
राधा हमरे ध्यान सदा अभिलाखई ।
निशदिन चरन सरोज हिये में राखई ॥
तातो पीवत दूध पगन ऊपर परो ।
रुकमिन तातें चरन हमारो ह्यां जरो ॥

५३२ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
रुकमिन मानी बात जु मनमोहन कही ।
ब्रजबासिन के प्रेम मगन मन ह्वै गई ॥
बहुरि कही हम नाहिं तुम्हें हरि भावई ।
मम हिरदै में चरन कमल नहिं आवई ॥
बोले हरि मम चरन नहीं तुम हीय में ।
निशदिन तो पग बसत हमारे जीयमें ॥ ३० ॥
बोली रुकमिन कुँवर सुनो घनश्याम जू ।
सब सुखदायक नाथ संपूरन काम जू ॥
मन्दर मन्दर भोग सदा भोगत रहो ।
व्याप न सकत बियोग सकल बिध सुख लहो ॥
रुकमिन कों कियो राजी खुसी बहु प्रीति सों ।
राधा की अब सुनों प्रेम की रीति कों ॥
सेज पै राधा कुँवर विरह की बावरी ।
कहत सखिन सों बोल लावरी लावरी ॥
मनमोहन घनश्याम कहां अबतक रहो ।
जो इक छिनहूं होत नहीं न्यारो भयो ॥
ऐसे कह उठ बैठ रही मुरझायकै ।
फिर गिररही इहि भांति तरफ दुख पाय कै ॥
बहुत भांति कही बात सखी समुझावई ।
मन में धारो धीर आवें तो - आवई ॥
इतनेही में आय श्याम पग धारिया ।
पायन खुरको सुनत विरह निरवारिया ॥३१॥
हिलत मिलत भुज मेल ग्रीव में प्रीत सों ।
बृन्दावन के केल करत वाही रीत सों ॥
लागे करन विलास कुँवर संग चावसों ।

कुरुक्षेत्रलीलावर्णन । ५३३
भूले सब रनिवास प्रेम के भाव सों ॥
प्रेम कथा दोऊ और की अस्तुति गावई ।
चरनदास बल जाय प्रेम कछु पावई ॥
भोरभये वह ठांव जु कुन्ती आइया ।
अपने सगरे पुत्र संगही लाइया ॥
तिह सों पूछत श्याम बहुत कुसरात है ।
पायन धारो सीस जु मिलबे की भांत है ॥
कुन्ती भाषत बैन सुनों भगवान जू ।
तुम सम याजग माहिं को चतुर सुजान जू ॥
इतने द्यौसन माहिं कभू नहीं सुध करी ।
दुरजोधन के बैर बिपत बहु हम भरी ॥
हौं यह अपने जीव विचारत ही रहूं ।
तुम भ्रातन को नाथ नहीं भूलत कभूं ॥ ३२ ॥
बोले तब बलराम मात तुम सत कही ।
दुख में होय सहाय हितू बंधू वही ॥
तोपै हमहूं चैन कभू नाहीं रहो ।
जरासन्ध के त्रास समंदबासा लहो ॥
बहुरो भीषम और विदुर ज्ञानी महा ।
बहुते और नरेश सबन दरशन लहा ॥
मिले परस्पर आय सबै घनश्याम सों ।
अस्तुति लागे करन श्याम अभिराम कों ॥
कहत धन्य जगमाहिं यह जादोंबंश है ।
इन सम और न कोय जु हरि को अंश है ॥
जनमें जिनके माहिं कृष्ण गोपाल हैं ।
दरस परस सुख देत सबन प्रतिपाल हैं ॥

५३४ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
फिर बोली ब्रजबाल श्याम सेती कहैं ।
आई दरशन काज न्हान सों ना हमें ॥
तुमको लख जदुराज सकल विध दुखगये ।
चार पदारथ आज हमैं प्रापत -भये ॥३३॥
पहिले ऊधो आय जोग समुझाइया ।
तब हमरे मन मांहिं कछू नहीं आइया ॥
अब मोहन मुख देख हिये निश्चै भयो ॥
ऋषिमुनि जोगीश्वरन यह सुखनाहीं लहो ॥
यह सुन बोले श्याम सुनों ब्रजनागरी ।
तुम हो परम सुजान सकल गुन आगरी ॥
जे सुख तुम्हरे साथ जो हमने पाइया ।
गृह वन बहुती भांतसों खेल मचाइया ॥
अब इह संपत माहिं प्रगट जो देखिये ।
सुपने हूं के माहिं न वहसुख पेखिये ॥
सर्व आत्मा रूप हमैं चित में धरो ।
सब जीवन को जीव हिये निश्चै करो ॥
तुम तो सुमरो मोहिं सदा चितलाय कै ।
हम रहिहैं तुम पास प्रीत के भाय कै ॥
आतमही सें रूप आत्मा देखिये ।
यह अध्यातम ज्ञान हिये अवरेखिये ॥ ३४ ॥
समझायो इह भांत सकल ब्रजबालको ।
सुफल जनम जग माहि भजें गोपाल को ॥
कूप रूप संसार सों बाहर ऊबरै ।
श्रीनन्दलाल कृपाल प्रीत डोरी गहै ॥
कहैं गुरु शुकदेव परिक्षत राजसों ।

कुरुक्षेत्रलीलावर्णन । ५३५
श्याम हुते उंही ठांव जु सुख के साज सों ॥
पांडौ पुत्र पवित्र और कौरौं जहां ।
आये दरशन पाय मुदित बैठे तहां ॥
जिनके सुमरन ध्यान सकल दुख भागई ।
आध व्याध कछु पीडन कबहूं लागई ॥
तिन को दरस सुखपरस जु कोऊ जन लहै ।
तिहकी महिमा अधिक रसन कैसे कहै ॥
जितने राजा भूप हुते वह ठाँव ही ।
अस्तुति लागे करन बहुत मन भावई ॥
पर्म हंस है नाम सकल संसार में ।
तुमतें चारों बेद प्रगट जु संचार में ॥३५॥
रक्षा करन धैन विप्र के तुम इहां ।
लीनों है औतार जगत के सांइयां ॥
आदि अन्त और मध्य संपूरन काम हो ।
तुमहीं को हम करत सदा परनाम हो ॥
इहविध अस्तुति करत हुते राजा सभी ।
पातक तज पग परस महा पदवी लही ॥
द्रौपदी रानी बहुर तहां जो आइया ।
जाकी महिमा अधिक सकल जग गाइया ॥
पटरानिन के बीच बैठी इक साथही ।
तिनसों लागी कहन बात इह भांतही ॥
हरि जू जैसी भांत ले आये ब्याह कै ।
सो सब हमरे पास कहो समझायकै ॥
रानी रुकपिन चतुर प्रथम बोली तबै ।
सुनहो द्रौपदीं जान बात हमरी अबै ॥
३६

५३६ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
धन्न हमारे भाग आजही लेखिये ॥
सहज ही तुम्हरो दरस नैन भर देखिये ॥३६॥
जो तुम हांसी करो नहीं इह बात सों ।
तो हम ब्याहकी बात कहें भली भाँत सों ॥
देस चंदेरो नगर सकल जग जानिये ।
तहां शिशुपाल नरेश सु प्रगट बखानिये ॥
भई सगाई मोहिं प्रथम ही वाह सों ।
साजी सगरी सोंज भली विध ब्याह कों ॥
आयो वह भूपाल साथ बहु भूपले ।
बांधो कंगन हाथ बहुत हुलसों हिये ॥
कुलकी सारी रीति करी बहु भांति ही ।
मम हिरदे में बसत श्याम दिन रातही ॥
अन्तरजामी लाल हिये की जानकै ।
कुन्दनपुर में आये दीनता मान कै ॥
रथ के ऊपर बैठ गरज कर धाइया ।
सब राजन के अग्रह में हरि लाइया ॥
हरि की सेवा मांहिं बहुत सुख मानियां ।
हम तो अपनो भाग धन्न कर जानियां ॥ ३७।
पुन सतभामा चतुर बात अपनी कही ।
मणि की सगरी कथा बखानी सब वही ।

  • : बहुरो अपनो व्याह जामवन्ती कह्यो ।
    जामवन्ती की कथा सबै जिह बिध भयो ॥
    पुन कालिंदी कहत सभी निज काथको ।
    रानी द्रौपदी सुनो हमारी बात को ॥
    हरि चरनन की आशधरी निज हीय में ।

कुरुक्षेत्रलीलावर्णन । ५३७
जलमें कीनों बास प्रीतधर जीय में ॥
इकदिन अर्जुन सहित श्याम पग धारिया ।
पान ग्रहन कर मोहि सकल दुख टारिया ॥
बहुरों बोली चतुर मित्र बिंदा तभी ।
रानी द्रौपदी बात सुनों हमरी सभी ॥
जबतें सुध भई मोहि तभी मन में करो ।
हरिचरणनको ध्यान और चित ना धरो ॥
मम भ्रातन गत मोहि लखी इह रीतसों ।
हरि को दीन्ही व्याह भली विध प्रीतसों ॥ ३८ ॥
हौं अपने जिय मांहि यही इच्छा लहूं ।
औरहूं जन मनमांहिं मैं हरि चरनन रहूं ॥
पुन सीता इह भांति बचन उचारिया ।
सात वृषभ की कथा सकल विस्तारिया ॥
भद्रा कहत सुनाय सुनों रानी द्रौपदी ।
मैं हूं कृष्ण की बात सुनी सरवन सभी ॥
मन में कीन्हों नेम और नाहीं भजूं ।
निशदिन हरि को सेव सदा जिय में सजूं ॥
जान पिता यह बात ब्याह हरिकों दई ।
इच्छा मनके मांहिं सकल पूरन भई ॥
सेवें हरिके चरन सुमन चित लायकै ।
सुभग भाग जिहनार सुफल है आइकै ॥
पुन बोली इहभांत लछमना गुन भरी ।
अपने व्याह की बात सकल बरनन करी ॥
तात हमारे काज स्वयंबर ही कियो ।
मैं हरिचरनन ध्यान हिये में गह लियो ॥ ३६ ॥

५३८ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
आये तहां घनश्याम दीन पहिचान कै ।
पानग्रहन कियो मोहि आपनी जानकै ॥
हों दासी घनश्याम की वा दिन तें भई ।
आध व्याध तज सकल बिथा जी की गई ॥
अब तुम देहु असीस मोहिं भली भांतिसों ।
जनम जनम जगदीश सेवों दिन राति हों ॥
बोली राजकुमार बहुरि सुख पायकै ।
सोरह सहस सौ नार सुबचन सुनाय कै ॥
भौमासुर हो दइत हमें बहु दुख दियो ।
हम सबहुन को घेर आन इकठा कियो ॥
चित में गह हरिशरन यही मनसा धरी ।
चरनन को धर ध्यान बहुत बिनती करी ॥
तबहीं पहुंचे आय जगत के साइयां ।
भौमासुर को मार सभी जु छुटाइयां ॥
तबतें सेवा मांहिं नाथ हमकों लियो ।
सब दासिन की दासी हमें सब को कियो ॥ ४० ॥
जो पै कृपा अगाध श्याम हमपर करैं ।
हम रंचक अभिमान नहीं जिय में धरैं ॥
गर्ब करै जो नार कभू घनश्याम सों ।
दुखपावे बहुबार गोपिका बाम ज्यों ॥
प्रेम कथा अति गूढ़ की अस्तुति कहा करूं।
चरनहि दासा होय शीश चरनन धरूं ॥
ब्रजवासिन के भाग बड़े जिय जानिये ।
केहूं बरने न जाहि योंहीं सत मानिये ॥
गृह बन जिनके संगरहै दिन राति ही ।

कुरुक्षेत्रलीलावर्णन । ५३६
कीन्हे बालचरित्र उहां बहु भांति ही ॥
ब्रजबासी नर नारि सकल बिध सुख दिये ।
सकल मनोरथ काम श्याम पूरन किये ॥
पुन सतभामा बोल तभी पूछन लगी ।
सुनहो द्रौपदी बात एक रस में पगी ॥
हम तो अपनी व्याह कथा सबही कही ।
अब तुम भाखो बात हमारे चित यही ॥ ४१ ॥
पांच जनन किह भांति तुम्हें जु बिवाहिया ।
अद्भुत लीला सुनन हिये में आइया ॥
त्तब बोली इह भांति द्रौपदी गुन भरी ।
हमरे तात बिचार प्रतिज्ञा यों करी ॥
फिरत मत्सको बेध जु कोई जन करै ।
द्रौपदी पावै सोई बचन यह ना टरै ॥
देश देश के नृप सबै तहां आइया ।
अपने पुत्र बिचित्र संगही लाइया ॥
धनुष बान निज हाथ तहां सबहुन लियो ।
फिरत मत्स को वेध किहूं नाहीं कियो ॥
अर्जुन अपने हाथ धनुष जबही लियो ।
ताही छिन के मांहि मत्स बेधन कियो ॥
याविध मोहि विवाहि मुदित मन लाइया ।
अपनी कुंती मायकूं शब्द सुनाइया ॥
मात एके बस्तु भली हमने लही ।
बांट लेहु तुम पांच मात ऐसे कही ॥
तातें पांचों भ्रात मोहिं ब्याहो तहां ।
प्रगट देह कर पांच जीव एकै जहां ॥ ४२ ॥

५४० श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
दोहा ॥
चरनदास बिसवास सों, कही कथा सुखरास ।
पढ़ै सुनै जो प्रीतसों, पावै परम हुलास ॥ ४३ ॥
अष्टपदी छन्द ॥
कहें गुरू शुकदेव परिक्षत राज सों ।
श्री बसुदेव के यज्ञ करन के काज कों ॥
रानी द्रौपदी पास हुतो रानी सबै ।
सुनी सकल की बात जु उन भाखी तबै ॥
गंधारी तिह संग सुभद्रा जानिये ।
कुंती तिनके बीच उहां मन आनिये ॥
सब गोपिन लिये संग जसोधा मायही ।
तिनहुं श्याम की बात सुनी मन लायही ॥
सुन अचरज की बात चक्रत मन में भई ।
हिय में बिसमै होय थकितसी है रही ॥
कहें धन्य ये नार सकल बड़ भाग हैं।
नितप्रत जिनके अंग श्याम संग लाग हैं ॥ ४४ ॥
और सकल ऋषराज सबै तहां आइया ।
मनमोहन घनश्याम को दरशन पाइया ॥
नारद वेदव्यास ऋषन के राजही ।
विश्वामित्र पुलस्त और भारद्वाजही ॥
गोतम और बशिष्ठ सतानन्द जानिये ।
पर्शराम अभिराम शिष्यन संग मानिये ॥
उत्रा अंगिरा और मारकंडे तहां ।
दत्तात्रेय बिचार सकल आये जहां ॥
बामदेव अरु जाग भाग भृगु आइया ।

कुरुक्षेत्रलीलावर्णन । ५४१'
गर्ग आदि बहु नावगिनें नहीं जाइयां ॥
हरि जू तिनकों आप बहुत आदर कियो ।
विध सो पूजा साज परम सुख ही दियो ॥
दोऊ करकों जोड़ जगत के साइयां ।
लागे अस्तुति करन बहुत मन भाइयां ॥
दुर्लभ दर्शन होहिं ऋषिन के जगत में ।
देवन प्रापत नांह बड़ा सी शक्त में ॥४५॥
जनम सुफल अब आज हमारो ही भयो ।
जो हम सहजके मांहि दरस तुम्हरो लह्यो ॥
हरि भगतन के दरस की महिमा को कहैं ।
जनम जनम के पाप छिनक में ना रहैं ॥
जो जन सेवा देव बहुत हितकै करै ।
तिनमें श्रीभगवान नहीं मनमें धरै ॥
महा अधम है सोइ यही मन आनिये ।
मूरख ताहि समान नहीं पहिचानिये ॥
नारायन सब बीच हिये में धारिये ।
सूरज चंद की सेव जु कुछ बिस्तारिये ॥
पृथ्वी जल और पवन अगन आकाश कों ।
देखै इनके बीच सु जगत निवास कों ॥
जो जन ऐसी भांत सों पूजा नित करै ।
सुफल कामना होय जु कुछ इच्छा धरै ॥
याही विध हरि भक्त सकल पहिचानिये ।
हरितें इनको भिन्न कभू नहीं जानिये ॥४६॥
यह नर देही जान अपावन है महा ।
जाको परथम बास नरकही में भया ॥

५४२ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
गंगाजल सम नाहिं सलिल सलितान कों ।
यह बिचार नहि होय मूरख अज्ञान कों ॥
राजन ऐसी भांत जगत के सांइयां ।
बहु अस्तुति उँहठांव करी मन भाइयां ॥
सकुचे सब ऋषराय सुनों जब बात कों ।
सब मिल ऐसी भांत कहें जदुनाथ कों ॥
तुम जग जीवन नाथ सुजमत निवासहो ।
हम दासन के दास तुम्हारी आस हो ॥
ऐसी विध जदुनाथ जु तुम अस्तुति करो ।
हमकों भर्म बहु होय समझ कछु ना परो ॥
जगत गुरू जगदीश जगत प्रतिपाल हो ।
सबके सरजनहार सकल रिछपाल हो ॥
सब देवन के देव तुम्हीं जदुराज जू ।
हम नहिं जानत भेव श्री महाराज जू ॥४७॥
तुम माया सब जगत सभी पर छाइया ।
तो गत अगम अपार अन्त नहिं पाइया ॥
तातै बहुती भांत भर्म मन आनई ।
तुम्हरो भेव अगाध कौन विध जानई ॥
तुम्हरो अद्भुत शक्त सकल घट पूर है।
तुम्हरो रूप अरूप सबन तैं दूर है ॥
कोऊ तुमकों आप पिता कर जानई ।
कोऊ अपनो पुत्र हिये में आनई ॥
सबके पालनहार सकल के ईश हो ।
कैसे चरित तुम्हार कहैं जगदीश हो ॥
दरस परस सुखदान तुम्हारो जानिये ।

कुरुक्षेत्रलीलावर्णन । ५४३
तुम किरपा सों बात यही पहिचानिये ॥
धरती भार अपार उतारन काज ही ।
प्रगटे भक्तन हेत श्री जदुराज ही ॥
बानी तुम्हरी बेद स्मृति संसार में ।
तुम्हरी गत नहा चीन्ह परत निर्धार में ॥ ४८ ॥
भक्तन ही के संग सदा जोह रहै ।
भक्त पदारथ पाय मुक्ति सोइ लहै ॥
तुम्हरी भक्ति अनूप सकल सुखरास है ।
कोऊ जन नहिं होत कभी जु निरास है ॥
तुम प्रभु पूरन काम कृपाल दयाल हो ।
तुमकों करत प्रनाम सुनों गोपाल हो ॥
पारब्रह्म भगवान धरम के धाम हो ।
तातै अस्तुति करत विप्रन को श्याम हो ॥
नातो हम मन मांहि चहत दिन रैन का ।
तुम्हरे चरन सरोज सुखद की रैन का ॥
पारब्रह्म प्रभू ईश हमारे हो तुम्ही ।
सब दासन के दास तुम्हारे हैं हमी ॥
तुम कारन बहुभांति जु हम जप तप करें ।
मनमें अपने ध्यान तुम्हारो ही धरैं ॥
सबहीबिध जगमाहिं तुम्हीं सुखदान हो ।
तुमकों करत प्रनाम सुनों भगवान हो ॥ ४६ ॥
सबही घट के मांहि रहो इह भांत में ।
जैसे पावक रहत गुप्त सब काठ में ॥
तुमकों श्री बसुदेव नहीं पहिचनियां ।
पुत्र जान बहुभांत हिये हित मानियां ॥

५४४ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
निद्रा आलस होत जभी नर रूपकों।
सुध बुध नाहीं रहत रंक और भूप कों ॥
सोवतही के माहिं सुपन जो देखिये।
जीव दिष्ट के साथ जु कौतुक पेखिये ॥
जोपे श्रीभगवान भेव नहिं जानिये।
देखन हारो सुपन को नां पहिचानिये ॥
ऐसें सगरे जीव भर्म मानैं सदा।
प्रभू पूरन को रूप सु पहिचाने कहा ॥
तुम्हरी किरपा होय `जभी जदुनाथ जू।
दिव्य दिष्ट नर लोय कों आवै हाथ जू ॥
सब जादों कुल बंस मोह लिपटानियां।
तुमरी गति अति गूढ़ इन्हू नहीं जानिया ॥ ५० ॥
जानौ अतिही हीन हमारी शक्ति कों।
करैं कौनविध नाथ तुम्हारी भक्ति कों ॥
तुम्हरे चरन सरोज जु सुखदाई महा।
जिहसों आध और व्याध नहीं व्याप्त सदा ॥
कृपा करो घनश्याम सकल हम दास पै।
तिन चरनन के पास हमारो निवासकै ॥
बानप्रस्थ जे लोय तुम्हीं कों धावईं।
जपतप कै मन आप तुम्हीं सों लावईं ॥
तुम्हरो रूप अपार ध्यान कर देखईं।
अपनो जीवन जनम सुफल कर लेखईं ॥
ज्यों गज चींटी आदि जु लघु दीरघ सबै।
सब बपु जीव समान जान लीजै अबै ॥
दीपक को दृष्टान्त यही जु बिचार है।

कुरुक्षेत्रलीलावर्णन । ५४५
लघु दीरघ सब ठांव वही उजियार है ॥
कोऊ जन यह बात न जिय में आनई ।
तनमें जिय किह ठांव रहत को जानई ॥ ५१ ॥
तैसें श्री घनश्याम सदा सुखरास ही ।
निसदिन श्री बसुदेव के गेह निवास ही ॥
राजनराम और श्याम जगत सुखदानजू ।
सुनकै ऐसी बात लगे मुसकान जू ॥
पुन बोले सुखपाय श्री नारद तभी ।
कहत सुनों बसुदेव वचन मेरे सभी ॥
कर्म नाश नहीं होय जु कर्मन कीजिये ।
यह निश्चे कर आप हिये धर लीजिये ॥
हरि की सेवा माहिं जोई जन चित धरै ।
मनमें अपने नाहिं कछू इच्छा करै ॥
तिह के कर्म कटजाहिं छिनक में जानिये ।
मुक्तहोय कुछ संस नहीं उर आनिये ॥
जो जन प्रभूकों पूजकै इच्छा फल चहै ।
पापकरैं तिह नाहिं मुक्त कैसे लहै ॥
श्रीभगवान के काज कर्म सब कीजिये ।
ताको फल जो होय उन्हीं कूं दीजिये ॥ ५२ ॥
होंही कहत न बात यह अपने जीय सों ।
कहत सबै सुज्ञान जु पण्डित हीय सों ॥
ऐसी बिध के कर्म जोइ जन साजई ।
कर्म बन्धतें छूट मुक्तपुर राजई ॥
जो तुम कहो यह बात के हम ग्रहवारी हैं ।
जोग जुगत के काज नहीं अधिकारी हैं ॥

५४६ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
तो तुमकों इक बात कहूं समुझायकै ।
कर्म जोग को पंथ कहूं मन लायकै ॥
जो कुछ पुन्न और दान सदाही तुम करो ।
नेम धर्म व्रत और जु कुछ मन में धरो ॥
तिनकों फल जो होय सु हरि कूं दीजिये ।
इच्छा मन के माहिं कछू नहीं कीजिये ॥
सो हरि तुमसों होय न न्यारो जानिये ।
सदा बसत गृह मांहिं तुम्हारे मानिये ॥
या विधि नारद बचन कहै बसुदेव सों ।
तब उनही मन मुदित पहिचानों भेव कों ॥ ५३ ॥
बहुरौ श्री बसुदेव बचन ऐसे कहो ।
सुनहु विप्रसुर ज्ञान बात चित में लहो ॥
हम को दीक्षा देहु जज्ञ के काज की ।
इच्छा पुरवै मोहि जु सुख के साज की ॥
विप्रन सुन यह बात बहुत सुख पाइया ।
बसुदेव सों अभिषेक तभी जो कराइया ॥
जज्ञ करन बसुदेव बैठे सब साज सों ।
संग लीन्हीं दोऊ नार जज्ञ के काज कों ॥
ल्‍बाये जज्ञ की सोंज सबै जादों तहां ।
सुर विमान चढ़ व्योम आये देखन उहां ॥
किन्नर और गंधर्ब गुनी आये सभी ।
हरि के गुन बहुभांत सबन गाये तभी ॥
ब्रह्मा सम बसुदेव तहां जु विराजई ।
गुर ज्यों सब उंह ठांव रिषी सुर राजई ॥
सोभत तहां जदुराज राम सुख साजही ।

कुरुक्षेत्रलीलावर्णन । ५४७
होत जज्ञ भली भांत जु उनके काजही ॥ ५४॥
बैठे बहुते विप्र और पंडित जहां ।
श्री वसुदेव ने दान बहुत दीन्हे तहां ॥
ऐसी विधिसों जज्ञ कियो चित लायकै ।
कर स्नान जो दान दिये मन लायकै ॥
सव राजन कों आय तभी पूजा दई ।
सवकी पूरी आस जु कुछ इच्छा भई ॥
सुर किन्नर गंधर्व तहां जो आइया ।
आय़ुस ले निज धाम सभी जु सिधाइया ॥
कौरों भीषम आदि और उन साथ के ।
बहुतै और नरेश हितू जदुनाथ के ॥
अस्तुति श्रीजदुराज की मिल सबहुन कही ।
नमस्कार करजोर सवन आय़ुस लही ॥
श्री वसुदेव सुजान वचन भाषन लगे ।
ब्रजबासिन के साथ प्रीत रस में पगे ॥
तुम तो प्रान समान हमारे हो सबै ।
तुमतें कैसी भांति होहिं न्यारे अबै ॥ ५५॥
या बिध कहत सुनाय प्रेम की बात