भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)

भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
DevanagariHindipublished690 पृष्ठ
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- कुरुक्षेत्रलीलावर्णन । ५२६
अपने पतिसों प्रीति सदा बिस्तारई ॥२५॥
तब राधा यह बात सभी मन में लही ।
अपनी प्रीत अधिकार सकुच नहीं कही ॥
यह सुनके-जदुनाथ जु ऐसे बोलिया ।
सबके नीकी भांत जु हिय दृग खोलिया ॥
एकै टौना जान सकल जग माहि है ।
इह सम टौना और दूसरो नांहिं है ॥
ब्रज भूमि सें एक यहै टौना आइया ।
सो मैं मूरतवंत तुम्हें दिखराइया ॥
मनबच करकै मोहिं जु चाहै बस करै ।
श्रीवृषभानुकुमारि की सेवा चित धरै ॥
रुकमिन के मनमाहिं जु सुनके आइया ।
यह टौना बड़भाग सों हमने पाइया ॥
रुकमिन तन मन-आप कुवर राधै दियो ।
राधाको मन मुदित प्रीत सों कर लियो ॥
तबहीं भूषण सरस जु रुकमिन के हुते ।
पहिरे राधा कुँवर जु मनमाने तबै ॥ २६ ॥
रुकमिन अपने हाथ भूषण पहिराया ।
इह बिध टौना डार कै प्रीत बधाइया ॥
और सखी जे साथ सिंगार सिंगारिया ।
सतभामा मन माहिं जु कुढ़ कुढ़ हारिया ॥
अष्टि सुगन्धि मँगाय आपने हाथ सों ।
ले रुकमिन सब लाये राधिका गात सों ॥
अतिही शुद्ध संवार जबै भोजन भये ।
नंद यसोधा पास तबै मोहन गये ॥