भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंकुरुक्षेत्रलीलावर्णन । ५४३
तुम किरपा सों बात यही पहिचानिये ॥
धरती भार अपार उतारन काज ही ।
प्रगटे भक्तन हेत श्री जदुराज ही ॥
बानी तुम्हरी बेद स्मृति संसार में ।
तुम्हरी गत नहा चीन्ह परत निर्धार में ॥ ४८ ॥
भक्तन ही के संग सदा जोह रहै ।
भक्त पदारथ पाय मुक्ति सोइ लहै ॥
तुम्हरी भक्ति अनूप सकल सुखरास है ।
कोऊ जन नहिं होत कभी जु निरास है ॥
तुम प्रभु पूरन काम कृपाल दयाल हो ।
तुमकों करत प्रनाम सुनों गोपाल हो ॥
पारब्रह्म भगवान धरम के धाम हो ।
तातै अस्तुति करत विप्रन को श्याम हो ॥
नातो हम मन मांहि चहत दिन रैन का ।
तुम्हरे चरन सरोज सुखद की रैन का ॥
पारब्रह्म प्रभू ईश हमारे हो तुम्ही ।
सब दासन के दास तुम्हारे हैं हमी ॥
तुम कारन बहुभांति जु हम जप तप करें ।
मनमें अपने ध्यान तुम्हारो ही धरैं ॥
सबहीबिध जगमाहिं तुम्हीं सुखदान हो ।
तुमकों करत प्रनाम सुनों भगवान हो ॥ ४६ ॥
सबही घट के मांहि रहो इह भांत में ।
जैसे पावक रहत गुप्त सब काठ में ॥
तुमकों श्री बसुदेव नहीं पहिचनियां ।
पुत्र जान बहुभांत हिये हित मानियां ॥