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सर्वकोश
भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)

भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)

Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas

सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished690 पृष्ठ

पृष्ठ 572, कुल 690 में से

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पृष्ठ 572

कुरुक्षेत्रलीलावर्णन । ५३१
बारेपन की टेव सभी पहिचान हूं ॥
जब सोवन की बेर वाह की आवई ।
बहु मेवन के ढेर सुमाय करावई ॥
पै राधा कों नींद नहीं कबहूं परै ।
जब लगही वह पान दूधको ना करै ॥
तातें वाको नींद न कबहूं आवई ।
मो बिन यह सुध और सु को हिय लावई ॥
पाय पलोटत माहिं तबै उठ धाइया ।
रुकमिन राधा सेज पै तरफत पाइया ॥
डार कटोरे माहिं जु दूध पिवाइया ।
हलबल में भली भांत न दूध सिराइया ॥
तातो दूध पिवाय कै आई रुकमिनी ।
दाबन लागी पाय श्याम के दुलहनी ॥
दावन चरन सरोज जभी कर में गह्यो ।
सीतकार कर पाय खैंच हरि जू लियो ॥२६॥
रुकमिन कह्यो तिहकाल कहा हमने कियो ।
सीजुखरी किहकाज खैंच क्यों पग लियो ॥
तातो हो वह दूध पिये तें पग जरे ।
हमरे पायन माहिं अबे छाले परे ॥
राधे पीवे दूध तुम्हारो पग जरो ।
हमसों ऐसी बात अटपटी जिन करो ॥
राधा हमरे ध्यान सदा अभिलाखई ।
निशदिन चरन सरोज हिये में राखई ॥
तातो पीवत दूध पगन ऊपर परो ।
रुकमिन तातें चरन हमारो ह्यां जरो ॥