भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
पृष्ठ 571, कुल 690 में से
संदर्भ में पढ़ें५३० श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
रुकमिन नाना भांति करे बिञ्जन सबै ।
अनगिन स्वाद न जाहिं गिनाए तासमैं ॥
भोजन को जब बैठे हेम के थारही ।
एक और जदुकुलिन एक ब्रज नारही ॥
कपट बचन बहुभांति जु सतभामा कहै ।
मुख मीठी मनचोख अधिक हिये में लहै ॥
कही करो जिन और परोसो लायके ।
दूध दही बहु भाँति मही जु मँगायके ॥ २७ ॥
खोटी जियमें जानि कुढ़ी रानी सबै ।
श्रीराधा सुन बैन जु मुसुकानी तबै ॥
भोजन सुखद कराय कुँवर सुखरास को ।
पौढ़ाई ले सेज सु अधिक विलास सों ॥
अपने अपने गेह सबै रानी गईं ।
रुकमिन राधा साथ करत बातें रहीं ॥
निस भई एसी भांत हिलत और मिलतही ।
सिज्या जोगा जोग बिछाई ललितही ॥
तब हरि अपने आई मन्दर पग धारिया ।
सबको सुख अधिकाइके दुख निरवारिया ॥
रुकमिन राधा कुँवर कूं सेज सुवाइ ही ।
आई हरी के पास पलोटन पाइ ही ॥
पाय पलोटत नींद श्याम को ना परी ।
सुन्दर राधा सेज पै तरफत है परी ॥
रुर्कमिन से कहो श्याम काज इक कीजिये ।
राधा आवत नाहिं नीन्द सुन लीजिये ॥ २८ ॥
हौं तो वाको भेव जीय को ज़ानहूं ।