सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)

भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)

Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas

सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished690 पृष्ठ

पृष्ठ 573, कुल 690 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 573

५३२ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
रुकमिन मानी बात जु मनमोहन कही ।
ब्रजबासिन के प्रेम मगन मन ह्वै गई ॥
बहुरि कही हम नाहिं तुम्हें हरि भावई ।
मम हिरदै में चरन कमल नहिं आवई ॥
बोले हरि मम चरन नहीं तुम हीय में ।
निशदिन तो पग बसत हमारे जीयमें ॥ ३० ॥
बोली रुकमिन कुँवर सुनो घनश्याम जू ।
सब सुखदायक नाथ संपूरन काम जू ॥
मन्दर मन्दर भोग सदा भोगत रहो ।
व्याप न सकत बियोग सकल बिध सुख लहो ॥
रुकमिन कों कियो राजी खुसी बहु प्रीति सों ।
राधा की अब सुनों प्रेम की रीति कों ॥
सेज पै राधा कुँवर विरह की बावरी ।
कहत सखिन सों बोल लावरी लावरी ॥
मनमोहन घनश्याम कहां अबतक रहो ।
जो इक छिनहूं होत नहीं न्यारो भयो ॥
ऐसे कह उठ बैठ रही मुरझायकै ।
फिर गिररही इहि भांति तरफ दुख पाय कै ॥
बहुत भांति कही बात सखी समुझावई ।
मन में धारो धीर आवें तो - आवई ॥
इतनेही में आय श्याम पग धारिया ।
पायन खुरको सुनत विरह निरवारिया ॥३१॥
हिलत मिलत भुज मेल ग्रीव में प्रीत सों ।
बृन्दावन के केल करत वाही रीत सों ॥
लागे करन विलास कुँवर संग चावसों ।