भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
पृष्ठ 581, कुल 690 में से
संदर्भ में पढ़ें५४० श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
दोहा ॥
चरनदास बिसवास सों, कही कथा सुखरास ।
पढ़ै सुनै जो प्रीतसों, पावै परम हुलास ॥ ४३ ॥
अष्टपदी छन्द ॥
कहें गुरू शुकदेव परिक्षत राज सों ।
श्री बसुदेव के यज्ञ करन के काज कों ॥
रानी द्रौपदी पास हुतो रानी सबै ।
सुनी सकल की बात जु उन भाखी तबै ॥
गंधारी तिह संग सुभद्रा जानिये ।
कुंती तिनके बीच उहां मन आनिये ॥
सब गोपिन लिये संग जसोधा मायही ।
तिनहुं श्याम की बात सुनी मन लायही ॥
सुन अचरज की बात चक्रत मन में भई ।
हिय में बिसमै होय थकितसी है रही ॥
कहें धन्य ये नार सकल बड़ भाग हैं।
नितप्रत जिनके अंग श्याम संग लाग हैं ॥ ४४ ॥
और सकल ऋषराज सबै तहां आइया ।
मनमोहन घनश्याम को दरशन पाइया ॥
नारद वेदव्यास ऋषन के राजही ।
विश्वामित्र पुलस्त और भारद्वाजही ॥
गोतम और बशिष्ठ सतानन्द जानिये ।
पर्शराम अभिराम शिष्यन संग मानिये ॥
उत्रा अंगिरा और मारकंडे तहां ।
दत्तात्रेय बिचार सकल आये जहां ॥
बामदेव अरु जाग भाग भृगु आइया ।