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सर्वकोश
भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)

भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)

Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas

सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished690 पृष्ठ

पृष्ठ 587, कुल 690 में से

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पृष्ठ 587

५४६ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
तो तुमकों इक बात कहूं समुझायकै ।
कर्म जोग को पंथ कहूं मन लायकै ॥
जो कुछ पुन्न और दान सदाही तुम करो ।
नेम धर्म व्रत और जु कुछ मन में धरो ॥
तिनकों फल जो होय सु हरि कूं दीजिये ।
इच्छा मन के माहिं कछू नहीं कीजिये ॥
सो हरि तुमसों होय न न्यारो जानिये ।
सदा बसत गृह मांहिं तुम्हारे मानिये ॥
या विधि नारद बचन कहै बसुदेव सों ।
तब उनही मन मुदित पहिचानों भेव कों ॥ ५३ ॥
बहुरौ श्री बसुदेव बचन ऐसे कहो ।
सुनहु विप्रसुर ज्ञान बात चित में लहो ॥
हम को दीक्षा देहु जज्ञ के काज की ।
इच्छा पुरवै मोहि जु सुख के साज की ॥
विप्रन सुन यह बात बहुत सुख पाइया ।
बसुदेव सों अभिषेक तभी जो कराइया ॥
जज्ञ करन बसुदेव बैठे सब साज सों ।
संग लीन्हीं दोऊ नार जज्ञ के काज कों ॥
ल्‍बाये जज्ञ की सोंज सबै जादों तहां ।
सुर विमान चढ़ व्योम आये देखन उहां ॥
किन्नर और गंधर्ब गुनी आये सभी ।
हरि के गुन बहुभांत सबन गाये तभी ॥
ब्रह्मा सम बसुदेव तहां जु विराजई ।
गुर ज्यों सब उंह ठांव रिषी सुर राजई ॥
सोभत तहां जदुराज राम सुख साजही ।