भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंकुरुक्षेत्रलीलावर्णन । ५४५
लघु दीरघ सब ठांव वही उजियार है ॥
कोऊ जन यह बात न जिय में आनई ।
तनमें जिय किह ठांव रहत को जानई ॥ ५१ ॥
तैसें श्री घनश्याम सदा सुखरास ही ।
निसदिन श्री बसुदेव के गेह निवास ही ॥
राजनराम और श्याम जगत सुखदानजू ।
सुनकै ऐसी बात लगे मुसकान जू ॥
पुन बोले सुखपाय श्री नारद तभी ।
कहत सुनों बसुदेव वचन मेरे सभी ॥
कर्म नाश नहीं होय जु कर्मन कीजिये ।
यह निश्चे कर आप हिये धर लीजिये ॥
हरि की सेवा माहिं जोई जन चित धरै ।
मनमें अपने नाहिं कछू इच्छा करै ॥
तिह के कर्म कटजाहिं छिनक में जानिये ।
मुक्तहोय कुछ संस नहीं उर आनिये ॥
जो जन प्रभूकों पूजकै इच्छा फल चहै ।
पापकरैं तिह नाहिं मुक्त कैसे लहै ॥
श्रीभगवान के काज कर्म सब कीजिये ।
ताको फल जो होय उन्हीं कूं दीजिये ॥ ५२ ॥
होंही कहत न बात यह अपने जीय सों ।
कहत सबै सुज्ञान जु पण्डित हीय सों ॥
ऐसी बिध के कर्म जोइ जन साजई ।
कर्म बन्धतें छूट मुक्तपुर राजई ॥
जो तुम कहो यह बात के हम ग्रहवारी हैं ।
जोग जुगत के काज नहीं अधिकारी हैं ॥