भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
५०८ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
जेते तीरथ और हैंरे अरे हेला तिन में है सिरदार ।
प्रगटी प्रभु के चरन सों महिमा अगम अपार ॥
अकाल मोत पावै नहींरे अरेहेला निहचै मनमें धार ।
शीश निवा दरशन करो मिटै कष्ट के भार ॥
बहुर जोन आवै नहींरे अरे हेला कहैं शुकदेव पुकार ।
चरणदास अचवन करो हरि चरनोदक सार ॥
आरती ।
आरती गंगा माई की कीजे । बस वैकुंठ महासुख लीजै ॥
स्वर्गलोक सूं गंगा आई । शिव की जटा में आन समाई ॥
सेवाकर भागीरथ लीनी । मृत्यु लोक में परगट कीनी ॥
फूल पान मिष्टान चढ़ावो । कर कर दरशन शीश नवावो ॥
शीश छुवाय न्हाय जो कोई । पाप कटें और निर्मल होई ॥
चरणदास शुकदेव बखानी । पतितउधारन सुरसरि जानी ॥
इति श्रीचरणदासजीकृत शब्द संपूर्णम् ।
अथ कवित्त प्रारभ्यते ॥
कवित्त ॥
जुगताधरि ध्यानधरैं जिसको तपसी तनगारिकै खाकलगावैं ।
चारसु वेद न पावत भेद बड़े तिरदेव नहीं गति पावैं ॥
अकास पताल मृत्युलोकहीमें जाको नामलिये सबहीसिरनावैं ।
चरणदास कहैं ताकूं गोप सुता करतारी दैकर नाच नचावैं ॥
पीतम्बर की मेखला मुद्रा किए कुंडल की चन्दन की विभूत
लायें देखो इक जोगिया । मुरली कीनादपूरै शब्द तौ कहै
अलेख दधहूकी भीख मांगै सबही बिध, भोगिया ॥ वाको
कवित्तवर्णन । ५०६
स्वरूप आली अटँको है मेरे चित कछु ना सुहात अब भयो
तन रोगिया ॥ कहै चरणदासि दोऊ नैना तो डिगम्बर भए
मिलत नाहीं प्यारो मन भयो है वियोगिया ॥
निसबासर ध्यानकरें प्रभुकौं रसना रससूं हरि नाम पढ़ी ।
जमनातट जाय अस्नान करें नित सेवाकरें इक पाय ठढ़ी ॥
दीनानाथ तुम्ही हम दीन प्रभू मोहिनाथ अनाथजु कीजे बढ़ी ।
चरणदास कहैं सुता भीषम की हरिनाम् लियें सुख सेज चढ़ी ॥
वेदहूं कूं मानें अरु पूजें पुरानहूं कूं गीताहू समझें जो गुरु ने
समझाई है । ब्राह्मणके पायलागूं मारूं मुख पण्डित को वेद
को छिपाय भेद और गत गाई है ॥ पढ़ पढ़कै अर्थ करें हिये
मांहिं नाहिं धरें करें ना विचार सब दुनियां भरमाई है ।
कहै सोतो करें नाहिं पण्डित एकहू माहिं शुकदेवजी के दास
चरणदास गति पाई है ॥
लीलाहैं अनन्त नामरूप हैं अनन्त जाके शक्ति हैं अनन्त
वारपारहू न पायो है । महिमा अपार रहे देव मौन धार मुख
जै जै उचार निज शीशहू नवायो है ॥ ब्रह्मासे अनन्त सोऊ
वेद को उचार करें नारद अनन्त जाको गुणाबाद गायो है ।
कहैं चरणदास सोई नन्दको दुलारो प्यारो देदे नवनीत
ब्रजबालन नचायो है ।
वेदविधि जग्य भोग अरप्योहू लेत नाहिं ग्वालन को
दधि झूठो खोस खोस खायो है । जाको भै मान लोकपालहू
नवायें शीश सोतो भक्तिभाव बस हाऊतें डरायो है ॥ जाकी
मायाबस जीवबँधे तिहुंलोकहूके सोतो प्रेम बस होय ऊखल
बँधायो है । कहैं चरणदास नँदनन्द ब्रजचन्द प्यारो नवनीत
काज ब्रज ग्वालनी नचायो है ॥
५१० श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
नेति नेति कहि ताहि वेदहू बखान करैं ब्रह्मा आदि सुर
मुनी निसदिन ध्यायो है । शेशहू रटत जाको पावत न ओर
छोर ताहि को यशोदा मैया गोद में खिलायो है ॥ शिव
सनकादि ताहि खोज खोज हारिरहे ब्रजबाला प्रेमबस रासहू
रचायो है । कहैं चरणदास शुकदेव के प्रताप सेती आदि
पुरुष भक्तिहेत नन्दगेह आयो है ॥
जाको ब्रह्मा वेद माहिं गावत हैं नेति नेति ताहि ब्रज
ग्वालवाल ख्यालहू खिलायो है । शिव सनकादि ताको
पावत न आदि अन्त पूतकहि ताहि बाबा नन्दने लड़ायो
है ॥ जाकी शक्ति आसरे खड़े हैं ब्रह्माण्ड पिण्ड ताको ब्रज-
नारी पाँय चलन सिखायो है। कहैं चरणदास शुकदेव के
प्रताप सेती आदि पुरुष भक्ति हेत नन्दगेह आयो है ॥
पद राग सोरठ ॥
नरायन नरायन रटो निज मूल ।
थोड़ासा जीवन घनीसी भूल ॥
आयाथा कुछ लाहा कारन लगा यहां तू पूंजीहारन ।
आगे साह लगेगा मारन अब तू करले जियका सूल ॥
जिनहरितेरी रक्षाकीनी ताती पवन लगन नहिं दीनी ।
तैं वाकी सेवा नहिं कीनी पानीसे तू किया अस्थूल ॥
अबतू विसर गया उस पियकू गर्भमांहि सुखदीया जियकू ।
तलमूड़ी ऊपरको पाँवथे जठर अगनि में रहा तू झूल ॥
अब तुम सुमरो श्रीपति देवा छिनमें पारलगवै खेवा ।
जबजम आवै जियकेलेवा हाथमें फाँसी अरु तिरशूल ॥
चरनहिदासकहैहितचितकी यह संसारखानि है बिषकी ।
जगत बड़ाई है दिन दसकी दया अमरफल पाप बबूल ॥
श्रीश्यामाश्याम ।
श्रीराधाकृष्णाय जुगलचरनकमलमकरन्दाय नमो नमः ॥
अथ श्रीमहाराज साहिब श्रीचरणदासजी कृत
कुरुक्षेत्रलीला प्रारम्भते ॥
अष्टपदी छन्द ॥
अपने गुरु शुकदेव कूं शीश निवायकै ।
साधो कहूं कथा भागौत सुनो चित लायकै ॥
चरणदास के इष्ट कृष्ण गोपाल हैं ।
दुख हरन सुख करन सुदीन दयाल हैं ॥
दसम स्कन्ध बिषै यह कथा सब गाइ है ।
राजा परिक्षित कूं शुकदेव सुनाइ है ॥
राज सिंहासन ऊपर बैठे थे हरी ।
काहूने सूरज गहन की चरचा आ करी ॥
जब श्री मोहनलाल मतौ मनमें कियो ।
न्हान चलैं कुरुक्षेत्र सबनसों यों कह्यो ॥
तब अधिकारन कूं बुला आज्ञा दई ।
बेग करो सामा चलबे की यों कही ॥
नगर द्वारिका लोगन कूं उत्सव भयो ।
सब काहू ने ठाठ चलन ही को ठयो ॥
हाथी और हथनाल घोड़े और पालकी ।
ऊंट कजावे साज डोले और नालकी ॥
रथ चंडोल सवारे सबै बनाय कै ।
सखी सहेली लई मांहि बैठाय कै ॥
तोप रहकले बान जु आगे चलाइया ।
५१२ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
खच्चर और घुरनाल को अन्त न पाइया ॥
नौवत और सहनाय नफीरी वाजई ।
तुरही और करनाय भेर धुन गाजई ॥
ध्वजा पताका निसान वनै मन भावनें ।
रंग सुरंग फरकें सुनहरी सुहावनें ॥
रुक्मिन और पटरानी आठों साथही ।
चाले सैन सिंगार द्वारिका नाथ ही ॥
राजा राना संग चले बहु साज सों ।
हौदा सों हौदा मिलाय और गजराज सों ॥
तीस और छः वाजे वजैं आनन्द सों ।
पण्डित गुनी महन्त चले जु घमण्ड सों ॥
सेना को दल जात न काहू पे गिनों ।
मानों उमड़ो मेघ चहूं दिस चौगुनों ॥
वेगही पहुंचे जाय क्षेत्र के माहिं ही ।
केई जोजन लों कटक परो वा ठांहिं ही ॥
राजन कूं आज्ञादई उतरो सबै ।
कर परिनाम जु आये डेरों में तबै ॥
सकल कुटुंब संग नहाये मोहन लाल हूं ।
दान दिये बहु भांतिन के तिह काल हूं ॥
रंक सबै राजा भये वा दान सों ।
विप्र पढ़ें धुन वेद जु बहु सनमान सों ॥
दोहा ॥
कर अस्नान भोजन कियो, पहरे बसन बनाय ।
चरणदास कहैं सभा में, जदुपति बैठे आय ॥
कुरुक्षेत्रलीलावर्णन । ५१३
अष्टपदी छन्द ॥
बातन हूँ में बातजु ब्रज की आइया ।
बोले श्री जदुनाथ परम सुख पाइया ॥
ब्रजवासिन की सुध जु कहूँ कोई पावई ।
हमसों कहियो आय यही मन भावई ॥
कृष्णकुंवर की सबै कही जो बनाय के ।
ब्रजवासिन की बात सुनौ चित लायकै ॥
अब ब्रजवासिन बात कहूँ मन भावती ।
प्रेम प्रीत रसरीत जु सबै सुहावती ॥
नन्द महर वृषभान गोप हूँ आइया ।
कीरत जसुधा आदि सबै तहां धाइया ॥
श्री राधा संग आई बहु ब्रज बाल हूँ ।
गइयन बछरन साथ आये सब ग्वाल हूँ ॥
उतरे आली ठौर मगन मन होय के ।
हरि के चरनों मांहि सुरत समोय के ॥
तबै अचानक बात कही कोऊ आय के ।
गहन न्हान घनश्याम हूँ आये धाय के ॥
देवकी और वसुदेव कुटंब संग आइया ।
नगर द्वारिका बासो सबहीं धाइया ॥ १ ॥
यह सुनके नन्दादिक कूं आनन्द भयो ।
खान पान गये भूल हिये में सुख छयो ॥
दौरो ढूंढो जाय कहां हरि ऊतरे ।
हम तो उन बिन भये काठ के पूतरे ॥
एक कूँ है देखे पहिचानें अकि नहीं ।
लाज मान हैं वे हमरे तन देखहीं ॥
राजा हूवे जाय द्वारिका नाथ हैं।
जदुबंसी कुल मांहिं तो जादव नाथ हैं ॥
सकल खण्ड के राजा शीश निवावई ।
हम तो मूढ़ गँवार कैसे जानें पावई ॥
राजाहू नहीं जानै पावे द्वार लों ।
खांहि छरिन की मार पौर रखवार सों ॥
होनी होय सो होय चलैं अरराय कै ।
मारहु खाते जांय धसैं दरराय कै ॥
आये सुन गोपाल सबै सुख पाइया ।
ग्वाल गोप ब्रजबाल जु अंग न समाइया ॥ २ ॥
धन धन है दिन आज भैया हरि आइया ।
कहैं परस्पर बात ऐसें बनाइया ॥
एक कहै वाहि गहि बृन्दावन लै चलैं ।
एक कहै हमदाँव आज लैं हैं भलैं ॥
कहै एक सुनोरे भैया हरि आवई ।
कहै एक चुप रहो आवन देहु तौ ।
अपने नैनन देख मिलो सुख लेहु तौ ॥
रौल बोल सुन गाय चक्रित सी हो रही ।
श्रवन देके बैन थकित सब हो गई ॥
हरि बिन जोवे धैन भई दुख पायसी ।
दूधहीन तनछीन रही मुरझाय सी ॥
कूदत फांदत चौंकी सुन यह बातही ।
मन आनन्द बढ़ाय फूली न समात ही ॥
हरष मान बछरन कूं लातें मारही ।
मुख थन नहिं दें है जु झिझक बिडारहीं ॥ ३ ॥
? No, let's look at whether there is a halant under 'छ' or 'ठ': Under 'छ': no halant. Under 'ठ': no halant. Wait, but in Hindi/Braj books from this era, is it pronounced/written पूछयोorपूछ्यो? Many people transcribe it as पूछयोorपूछ्यो. But look closely at पूछयो: is there any ligature? No, it's छandयो. Wait, let's look at कह्योin L17: 'क', then 'ह' with 'य' inside it? No, 'ह' followed by 'यो'! Wait, in Hindi, it's often writtenकह्यो, उठ्यो, पूछ्यो, where 'ह्यो' has 'ह' + 'य'. But wait, in standard unicode, writing पूछयोvsपूछ्यो: Wait, let's look at L12 again: Is the letter 'छ' or 'छ'? Yes. Is the letter after it 'यो'? Yes. Wait, could it be पूछयो? Yes, पूछयो. Wait, what about उठ्यो? In Hindi poetry, उठ्योvsउठयो? Actually, let's check उठ्यो` in L1
५१६ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
जैहूँ अपने नन्द जसुधा माय पै ॥
लरकाई फिर होय तौ वह सुख पाइये ।
खेलूं अंगना जाय दही फिर खाइये ॥
देवकी और वसुदेव बिसर दोऊ गये ।
आंसू पर आंसू गिर भीज बसन नये ॥
श्याम सुन्दर को प्रेम उमड़ सरिता वही ।
भक्तों की कर सुरत चरणदासा कही ॥५॥
रोवत कान्ह सुजान कही कोऊ जायके ।
दौर देवकी माय चक्रित भई आयके ॥
कुंवर लाडलो कान्ह काहे कूं रोवई ।
आय देवकी बात पूछती यों भई ॥
मुख ऊपर कर फेर पोंछ आंसू सबै ।
तोपै वारी जांव बलैयाँ ल्यूं अबै ॥
बहुरों जल की धार नैनन भर आवई ।
थंभ नहीं सकत जु प्रेम प्रवाह वहावई ॥
कहत पुकार पुकार कहा भयो पूत कूं ।
जानें कही कछु बात ल्यावो वा दूत कूं ॥
दुःख हरन सब जगत को मेरो लाल है ।
कैसें रोवत जात भयो बेहाल है ॥
नन्द यशोदा माय जु आये होहिं तौ ।
उन के आये सुनै काहै कूँ रोव तो ॥
लेहु बुलाय आपने यशोदानन्द कों ।
एतो दुःख क्यों भयो जुआनन्दकन्द कों ॥६॥
आगै हू जु कबै सुध उनकी आवती ।
रोवत देखत याहि महा दुख पावती ॥
कुरुक्षेत्रलीलावर्णन । ५१७
धन्य द्योस है आज प्यारे परताप को ।
दरस करें हम तेरे माय और बाप को ॥
बोली देवकी माय और वसुदेव जी ।
माय बाप मिलबे की बधाई देहु जी ॥
मिलनें दैहैं जबै बधाई देहुगे ।
बैठ गोद के मांहि परम सुख लेहुगे ॥
बोले कृष्ण मुरार माय सुन लीजिये ।
जगत बिषे कहा वस्तु बधाई दीजिये ॥
तन मन सम कुछ वस्तु नहीं ब्रह्माण्ड में ।
सो तन तुमही दियो सदा जु अखण्ड में ॥
पूछत राजा परिक्षित श्री शुकदेव कूं ।
तीन लोक को नाथ कहौ रोवे जु क्यों ॥
जब बोले शुकदेव न संशय मान तू ।
भक्तों बस भगवान यह निहचै जान तू ॥ ७ ॥
साध चहैं सोई करें यह भेद अगाध है ।
हरि साधों के मांहि मांहि हरि साध है ॥
कोई सखी रनवास में बात सुनाइया ।
सिंहासन पर रोवत श्याम कन्हाइया ॥
सरवन सुन यह बात सबै हक धक रहीं ।
सबही दौरी आय कि परदौ लग रही ॥
चिक के भीतर खरी सकुच और लाज सों ।
मधुर बचन कह पूछत ए रोवैं जु क्यों ॥
बोल उठी जब माय देवकी बात हूं ।
ब्रजबासी, मिल आये ग्रहन की जातहू ॥
दूध पिवाय हँसाय जु लाड़ लड़ाइया ।
५१८ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
सो जसुमत और नंदहू ब्रज तें आइया ॥
माय हेत की बात सुनी गोपाल ने ।
यातें रुदन कियो है मेरे लाल ने ॥
महा मूढ़ अज्ञान कंस के त्रास तैं ।
पठियो थो मैं उन के घर या आस तैं ॥ ८ ॥
याकी ढीठी और मचलाई सब सही ।
माखन चोर्यो सव ग्वारिन को और मही ॥
काहू तैं लरतो भिरतो काहू तैं भाज तो ।
अब सूधो हो गयो भयो महाराज तो ॥
प्रीत पुरातन जान आईं ब्रज नागरी ।
सुन्दर रूप सरूप सबन तें आगरी ॥
सब रानी मुसकाय बात ऐसें कही ।
धन धन धन हैं भाग आज हमरे सही ॥
रुक्मिन और सतभामा वचन सुनाइया ।
राधाजू कूं लीजे श्याम बुलाइया ॥
बृन्दावन की लीला सब दिखलाइये ।
ब्रजबनिता और ग्वालहिं बेग बुलाइये ॥
पीताम्बर और लकुट मुकुट माथे धरो ।
गुंजमाल हूं पहर रूप नटवर करो ॥
मिल गावो और नाचो अनिही हुलास सों ।
हमकों आनन्द दीजे रास बिलास सों ॥ ६ ॥
ये बातें सुन श्याम रोवते हँस परे ।
अति आतुर उठ चाले भाजे गहबरे ॥
सिहासन तें उठे पीव नांगे भले ।
कोऊ लियो नहीं संग अकेले ही चले ॥
कुरुक्षेत्रलीलावर्णनं । ५१६
निर्विकार निर्लेप जु माया सूं परे ।
प्रेम प्रीत बस होय चले दौरे खरे ॥
बात सुनी ब्रज लोगन आवें हैं हरी ।
लागे करन सिंगार धूम अति ही परी ॥
इक इक सूथन द्वे द्वे जन पहरन लगें ।
एक पाग द्वे गोप बांध रस में पगै ॥
इक सारी द्वे नारी पहरन कूं लगी ।
हरषत बरषत प्रेम प्रीत रंग में रंगी ॥१०॥
दोहा ॥
कोऊ मुतियन माला पहर, कोऊ चन्दन हार ।
चरणदास कहैं ब्रज नागरों, ऐसें कियो सिंगार ॥
अष्टपदी छन्द ॥
दिट्ट परे जसुदा की आवत श्याम जू ।
फुलत भई मन माहिं देखि घनश्याम जू ॥
लटक चाल पर वारी जाऊं लालजू ।
आज धन्य हैं भाग आए गोपाल जू ॥
फूलै अंग न समाहि गोप सब यों कहैं ।
इक कूदत इक कूकत उछरत डोलते ॥
एकन मूंगन माला लई उतार कै ।
गुंजमाल ता पलटे दी पहिनाय कै ॥
त्यों त्यों है मन मुदित श्याम मन भावते ।
ज्यों ज्यों निज सिंगार ग्वाल पहरावते ॥
हेम बरन पीताम्बर ग्वालन ले लिये ।
कारो कामर कान्ह कों तापलटे दिये ॥
३५
५२० श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
जदुबंसी सब देख रीझ हंस हंस परे ।
दुख सुख अचरज पेख वचन मुख से कहैं ॥११॥
सबको करत समोध चले यदुराजही ।
दरशन तात और मात करन के काजही ॥
गये यशोदा मायपै जा पाँयन परे ।
ब्रजनारिन बहुभीर सबन दर्शन करे ॥
गई सकल सुध छुवत पगन सों हाथ कै ।
मन गहवर भर नैन आये जदुनाथके ॥
जसुमत लीन्हे खैंच हिये सों लाइया ।
संग सोवन के द्योस तबै सुध आइया ॥
मुख चूंबै चितवै तकै मुरझायकै ।
फिर फिर वारनैं जाय माय उरलायकै ॥
एक कहै इहि भांति छाड़हो भीर को ।
देखन देहु सुजान श्याम बलवीर को ॥
सुन्दर मुखकोंदेख मुदित जसुधा भई ।
राजचिह्न औ रेख भई आनन्द मई ॥
बोली जसमत माय कुंवर जदुराज सों ।
तू क्यों रोवेलाल कहो किंह काज को ॥१२॥
कहत यसोधा माय सुनौं मेरी बातकों ।
इकछिन न्यारे न होहु हमारे साथ सों ॥
इहिविधि बाबा नन्दहू मोहन सों मिले ।
बालापनकी बैसहुते उन संग हिले ॥
नन्द महर गोपाल लखे मन भावते ।
होय विकल तिह काल नैन भर आवते ॥
मूंद रहे दोऊ नयन सुनै नहीं बैन कों ।
कुरुक्षेत्रलीलावर्णन । ५२१
जैसे बालक होय मचलगए चैनसों ॥
देखत मोहनलाल उठे घुरराय कै।
तबहीं पकरे पांव नन्द के आय कै॥
गदगद बानी कंठ बात नहिं कहसकै ।
ए कहा जानें रोय श्याम मुख सब लखै ॥
इक कूकत इक कूदत धरती में परैं ।
एक मगन हरि दरसतें सुध बुध ना धरैं ॥
कहैं एक हम धन्य लखे गोपाल जू ।
एक कहे छांड़ो भीर लखें नन्दलाल जू ॥ १३ ॥
ऊपर गिरत संभार बहुर पग कों धरे ।
योंही सुरन अकास विमानन सों भरै ॥
चेते जब सुध आय आपने मातकी ।
अद्भुत लीला मिलन बधाई तात की ॥
जिंह नाते के लोग भांत वाही मिले ।
अन नाते हू मिलत कमोदन ज्यों खिले ॥
ना कोऊ नातो मानैं न मन में आनई ।
लोकलाज व्योहार नहीं पहिचानई ॥
ठेल पेल इक कूद निकस के धावई ।
परसत मोहन पाय परम सुख पावई ॥
एक दौर घनश्याम कों कहत सुनाय कै ।
हा हा मोहिं दिखाव लखैं चित लायकै ॥
कहैं एक हम देखें सुन्दर मोहना ।
रूप सरूप अनूप चित्र ज्यों सोहना ॥
कहैं एक मिल झुण्ड जाय हूं धाय कै।
दौर गहूंगी पाय माथ सिर नायकै ॥ १४ ॥
५२२ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
इक ठाढ़ी तिह ठांव लाल घूंघट किये ।
अतिही ब्याकुल (चित्त) अंग बहुत चिन्ताहिये ॥
मन मेंअधिक उदास उसासें दुख भरी ।
भेद न काहू देत लखै सब तन खरी ॥
कहै एक इह भांति जो श्याम दिखावई ।
मेरे सबही अंगके भूषन पावई ॥
छोटी कहत सुनाय हमें उचकावहो ।
अपनो श्याम सुजान नेक दिखरावहो ॥
बड़ी बड़ी जे नार सोई सुख पावई ।
हम नान्हीं क्यों भई यही पछतावई ॥
लालता अति परवीन सखिन के संग में ।
आई छवि सोँरँगी प्रेम के रंगमें ॥
दरशन कर सुख पाय पाय कों गह रही ।
पुरातन प्रीति जनाय चुंहटिया भरलई ॥
ताकत नैन निहार धीर नाहीं धरे ।
कर ललचोहैं नैन लजोहैं रस भरे ॥ १५ ॥
चंद्रावलि तिंह भांति आई छवि धारकै ।
पाँयन लायो सीस सरूप निहार कै ॥
भाल चरन घस होठ लगाये पाय कै ।
चांपो हरि को पांय सुदांत लगाय कै ॥
मीठी काटन काट सनेह बढ़ाइया ।
पाछै तरवा चाट के प्रेम जनाइया ॥
तब श्रीराधा कुँवरि चली हरि दरसकों ।
मिल सखियन के झुण्ड श्याम घन परस कों ॥
राधा विरह वियोग तपत परबल भई ।
कुरुक्षेत्रलीलावर्णन । ५२३
लहुकत कँपत सब गात जु हरिके ढिग गई ॥
तस नीर दोऊ नैन ढुरै धरती परै ।
घूंघट में अकुलाय तरफ फटकी मरै ॥
ते अँसुवा की बूंद परी द्वे आय के ।
मानों चिनगी आग परी हरि पाय पै ॥
कीनों श्याम विचार कौन यह विरहनी ।
तस इतीतन माहिं विपता हिये घनी ॥१६॥
चरन छुवें हग नीर सीतल सलता वही ।
इन लछन जानी कुँवरि राधा यही ॥
दुरदुर हरि के पांय परै बल्हाइयां ।
मुरमुर बारम्बार वारनै जाइयां ॥
उतेरही गह पांय प्रीत अधिकार सों ।
सीस उठायों नांहिं न देह संभारसों ॥
मन में हरि तिय चरन कों सीस निवावई ।
मस्तक दे वाही ठोर न फेर उठावई ॥
जब इह भावना भाव श्याम मनमें धरो ।
तब हरि पगतें कुँवर शीस न्यारो करो ॥
अंतर जामिन कुँवर जान हरि जीय में ।
सोरह सहस रनिवास बिसारो हीय तें ॥
मन में निश्चय धार यही हरि जानियां ।
सब रानिन सिरमौर कुँवर उर आनियां ॥
अति व्याकुल सब अंग परी मुरझाय कै ।
यह गत देखी लाल लई उठि धाय कै ॥१७॥
अति अचेत सुध नाहिं बदन पियरी परी ।
अंग आवत परसेव होत सियरी खरी ॥
५२४ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
जब केहू सुध आय चेत तन जागिया ।
अति गहबर हिए होयके हुलकी लागिया ॥
सखियन यह गत देख उरहनौं बहु दियो ।
डरप सकुच मन माहिं कुँवरि घूंघट कियो ॥
योंही दाऊ बलदेव लैन हरि आइया ।
बाहन नाना भांति संगही ल्याइया ॥
जथा जोग सब लोग मिले अति चाइसों ।
आनँद उर न समाय प्रीति के भाइ सों ॥
नन्द जसुधा माय दोउ बिनती करें ।
अब हम दरशन पाय इहां तें ना टरैं ॥
पुत्रन एसो बिचारन और बिचारिए ।
चरनन संग जो लागन मार बिडारिए ॥
हम ह्याही रहजाहिं न तुम्हरो खांहिगे ।
तुम्हते न्यारे होत तभी मर जांहिगे ॥१८॥
गइयां हूं बिन दूध सूख भई दूबरी ।
आतुर हैं हरि दरस करन सेब ऊबरी ॥
कहै हमारी बात पशुन की को कहै ।
अन्तरगत की पीड़ हमारी को लहै ॥
क्यों हमकों गोपाल दयाल बिसारिया ।
काहे पशु की जौन में हमकों डारिया ॥
यह कह गइयां सिमट घरेराही दियो ।
जित तित तें मिल आय अरेराही कियो ॥
करकें ऊंची नार कान नोरावंही ।
आपन दौरत और बच्छन दौरावहीँ ॥
देखत हरि को रूप मचल सी सब गई ।
कुरुक्षेत्रलीलावर्णन । ५२५
मनमोहन कर प्रीत अंक में भर लई ॥
हित कै फेरत हाथ पीठ और देह पै ।
हेरत हरि को रूप सबै अति नेह कै ॥
लै लै उनको नाम जु श्याम बुलावई ।
देख दूवरो गात आंसू भर आवई ॥१९॥
गायन नांते कहत श्याम बहु प्रीति सों ।
हरषत सगरे लोग देख इह रीत को ॥
नांतिन घूमर गाय की यह खञ्जन भली ।
जिन सुख दीन्हो मोहिं बहुत हमसों हिली ॥
बेटी काजर गाय की धौरी जानिए ।
धौरी की सिरमौरी सुता पिछानिए ॥
ब्रजवासिन को प्रेम सबन सों आगरो ।
चरणदास भागोत में देख उजागरो ॥
कही न कैहूँ जाय श्याम की गुन कथा ।
जैसे सो त्यों मिले सकल जीवन जथा ॥
द्वारा बासी लोग सकल अचरज करैं ।
देखत रस संजोग हिये आनन्द भरैं ॥
बलदाऊ और श्याम चले आनन्द सों ।
ब्रजबासी ले संग सुतारे चंद ज्यों ॥
वाहन नाना भांत सब तहां आढ्या ।
राज तेज की चालसों ठाठ चलाइया ॥२०॥
हेम छरी कर मांहिं जुरत नजराइया ।
ते राजन के गात पौरयन लाइया ॥
ब्रजबासी सब लोग जु पहुंचे आय के ।
उतरे सबही जाय निकट जदुराय के ॥
३२६ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
अज्ञा दई घनश्याम न काहू रोकियो ।
भीतर गये ब्रज लोग अधिक हरषो हियो ॥
बिछै बिछौना बहुत जु नाना भांति के ।
तहां दीन्हें छुटकाय हितू जदुनाथ के ॥
देवी और बसुदेव जु मिलबे कों चले ।
नंदहु अरु बसुदेव दोऊ प्रीतम मिले ॥
नैनन नीर प्रबाह नही थांभोथमै ।
जसुमति देवी देख लोग रोवत सबै ॥
सुनो देवकी बात जु सांचीहों कहूँ ।
लाख करो नहीं जांव सदा ह्याईं रहूँ ॥
जथा जोग सब लोग मिले उठ धाइकें ।
मुदित भये मन मांहि दरस हरि पाइकें ॥२१॥
कहें श्री बसुदेव सुनो नंदराय जू ।
तुम्हें मिले सुख होय सकल दुख जाय जू ॥
कीन्ही कृपा अपार बहुत उपकार में ।
तुमतें उरन न होंहिं कभू संसार में ॥
राम कृष्ण अभिराम तुम्हीं हमकों दिये ।
तुम्हरेही परताप सों ए राजा भये ॥
सब गोपी ब्रजबाल देवकी पग परी ।
कुँवरि राधिका जान तभी अंकों भरी ॥
राधा अपनों सीस जु पायन पै धरो ।
देवी पकरी बांह करो सनमुख खरो ॥
ठोडी गह जब रूप - अनूपम देखिया ।
सब रानिन के रूप को राजा पेखिया ॥
अपने मन के मांहि तबे देवी कही ।
कुरुक्षेत्रलीलावर्णन । ५२७
हरिपै कैसी भांति सु यह छोड़ी गई ॥
तिंह ओसर सब बोल बहू देवी लई ।
जसमत मिलबे काज सबै धाई गई ॥ २२ ॥
श्रीरुक्मिन परबीन जु दुलहिन रस भरी ।
ब्रज दूलह सों आय यही बिनती करी ॥
हों करहों चितलाय हमारे मन यही ।
श्रीराधा सनमान श्याम सों यों कही ॥
आज्ञा दई घनश्याम संग ले जाइये ।
श्रीराधा संजोग सों आनंद पाइये ॥
श्रीरुक्मिन परबीन जु राधा ढिग गई ।
बांह पकर हंस भेट उठाकै संग लई ॥
अपनी ओट छिपाय राधकै ले चली ।
कापै बरनी जाय घूंघट की छबि भली ॥
रुक्मिन ऐसी भांत कियो रस प्रीत सों ।
ज्यों हरिजूं के साथ प्रेम परतीत सों ॥
रुक्मिन की किंह भांते बड़ाई को कहै ।
सुखदाई घनश्याम को सुखदाई वहै ॥
हरिजूं की रुचिजान बहुत ही सुख दियो ।
सखी सहेलिन सहित अधिक आदर कियो ॥ २३ ॥
एक एक ब्रजनारि रूपकी आगरी ।
निरख अचंभो थकित रही सब नागरी ॥
सुख देबे कों श्याम तहां पग धारिया ।
हरखत आये प्रेम प्रीति बिस्तारिया ॥
तब सतभामा आदि कहैं रानी सबै ।
हरिजूं हमहिं दिखाव कुँवरि राधा अबै ॥