भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
पृष्ठ 583, कुल 690 में से
संदर्भ में पढ़ें५४२ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
गंगाजल सम नाहिं सलिल सलितान कों ।
यह बिचार नहि होय मूरख अज्ञान कों ॥
राजन ऐसी भांत जगत के सांइयां ।
बहु अस्तुति उँहठांव करी मन भाइयां ॥
सकुचे सब ऋषराय सुनों जब बात कों ।
सब मिल ऐसी भांत कहें जदुनाथ कों ॥
तुम जग जीवन नाथ सुजमत निवासहो ।
हम दासन के दास तुम्हारी आस हो ॥
ऐसी विध जदुनाथ जु तुम अस्तुति करो ।
हमकों भर्म बहु होय समझ कछु ना परो ॥
जगत गुरू जगदीश जगत प्रतिपाल हो ।
सबके सरजनहार सकल रिछपाल हो ॥
सब देवन के देव तुम्हीं जदुराज जू ।
हम नहिं जानत भेव श्री महाराज जू ॥४७॥
तुम माया सब जगत सभी पर छाइया ।
तो गत अगम अपार अन्त नहिं पाइया ॥
तातै बहुती भांत भर्म मन आनई ।
तुम्हरो भेव अगाध कौन विध जानई ॥
तुम्हरो अद्भुत शक्त सकल घट पूर है।
तुम्हरो रूप अरूप सबन तैं दूर है ॥
कोऊ तुमकों आप पिता कर जानई ।
कोऊ अपनो पुत्र हिये में आनई ॥
सबके पालनहार सकल के ईश हो ।
कैसे चरित तुम्हार कहैं जगदीश हो ॥
दरस परस सुखदान तुम्हारो जानिये ।